मरो रे जोगी मरो

Shyam Nivas
0

 **मरो रे जोगी मरो — शून्य से पूर्णता की ओर योग का शाश्वत संदेश**

### भूमिका: मृत्यु का रहस्य और कबीर का चिंतन

"मरो रे जोगी मरो..." — यह मात्र एक पंक्ति नहीं, बल्कि भारतीय अध्यात्म, दर्शन और संत-परंपरा की सबसे साहसी और रहस्यमयी घोषणाओं में से एक है। संत शिरोमणि कबीरदास जी की यह वाणी सामान्य सांसारिक दृष्टि रखने वाले व्यक्ति को स्तब्ध कर देती है। एक ऐसा समाज जहाँ हर व्यक्ति जीवन की भीख माँग रहा है, जहाँ हर साँस को बचाने के लिए अमरता की खोज की जा रही है, वहाँ एक फकीर चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है — *मरो!*

लेकिन कबीर जिस 'मरने' की बात कर रहे हैं, वह कोई शारीरिक आत्महत्या नहीं है। वह किसी अस्पताल के बिस्तर पर साँस छोड़ना नहीं है, न ही वह किसी अवसाद या निराशा से उपजा हुआ कदम है। यह 'मरण' तो अध्यात्म का सबसे बड़ा महोत्सव है। यह अहंकार की मृत्यु है, यह 'मैं' और 'मेरा' का अंत है, और यह उस चेतना का जन्म है जो काल से परे है।

कबीर का यह पद साधना की उस पराकाष्ठा का वर्णन करता है जहाँ साधक अपने ही सीमित अस्तित्व को मिटाकर उस असीम में लीन हो जाता है। आइए, इस कालजयी पद के एक-एक शब्द, इसके दार्शनिक आधार, इसकी यौगिक प्रक्रिया और आधुनिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता को गहराई से समझें।

### मूल पद और उसका भावार्थ

कबीर साहब का यह प्रसिद्ध पद इस प्रकार है:

> **मरो रे जोगी मरो, मरण है मीठा।**

> **तिस मरणी मरो, जिस मरणी काजिदास (गोरख/कबीर) दीठा॥**

> **जिस मरणी से जग डरे, मेरो मन आनंद।**

> **कब मरिहूँ कब देखिहूँ, पूरन परमानंद॥**

**सरल शब्दों में अर्थ:**

हे योगी! तुम उस मृत्यु को प्राप्त हो जाओ जो अत्यंत मधुर है। साधारण संसार जिस मृत्यु से डरकर थर-थर काँपता है, संत और योगी उसी मृत्यु की प्रतीक्षा एक उत्सव की तरह करते हैं। साधारण मृत्यु शरीर को नष्ट करती है, लेकिन साधना की यह मृत्यु व्यक्ति के अज्ञान, वासना और क्षुद्र अहंकार को नष्ट करती है। जब यह 'मैं' मरता है, तब ईश्वर या परमानंद का साक्षात् प्रकट होना होता है।

### 1. 'मरण है मीठा': मृत्यु में मिठास कैसे?

आम इंसान के लिए मृत्यु भय का सबसे बड़ा कारण है। मनुष्य जीवन भर धन, पद, प्रतिष्ठा और संबंधों को सहेजता है, और मृत्यु उन सबको एक झटके में छीन लेती है। इसीलिए मृत्यु को कड़वा, भयानक और दुखद माना गया है। तो फिर कबीर इसे 'मीठा' क्यों कह रहे हैं?

इस मिठास को समझने के लिए हमें स्वतंत्रता के आनंद को समझना होगा।

 * **पिंजरे से मुक्ति:** कल्पना कीजिए एक पंछी की जो वर्षों से एक लोहे के पिंजरे में बंद है। उस पिंजरे का टूटना पंछी के लिए अंत नहीं, बल्कि खुले आकाश में उड़ने की शुरुआत है। हमारा अहंकार और हमारा देह-भाव उस पिंजरे की तरह हैं। जब साधक ध्यान और योग के माध्यम से इस देह-अहंकार को तोड़ता है, तो उसे अनंत स्वतंत्रता का अनुभव होता है। यही स्वतंत्रता 'मिठास' है।

 * **दुविधा का अंत:** जीवन भर मनुष्य 'मैं यह हूँ', 'मैं वह हूँ', 'मेरा क्या होगा' जैसी मानसिक उथल-पुथल में जीता है। साधना में जब यह 'मैं' ही समाप्त हो जाता है, तो सारे द्वंद्व, भय और तनाव अपने आप समाप्त हो जाते हैं।

### 2. योग साधना और सांकेतिक मृत्यु

नाथ परंपरा और हठयोग में 'मरण' का अर्थ बहुत विशिष्ट है। गोरखनाथ से लेकर कबीर तक, सभी योगियों ने इस अवस्था को 'उन्मनी अवस्था' या 'अमनस्क अवस्था' कहा है।

#### समाधि ही वास्तविक मृत्यु है

जब कोई योगी समाधिस्थ होता है, तो बाहर से देखने पर उसका शरीर एक शव की भांति शांत हो जाता है। श्वास की गति अत्यंत सूक्ष्म या रुक सी जाती है, हृदय की धड़कनें धीमी हो जाती हैं, और मस्तिष्क की तरंगें शांत हो जाती हैं। विज्ञान की भाषा में यह एक प्रकार की 'सस्पेंडेड एनिमेशन' हो सकती है, लेकिन योग की भाषा में यह 'जीवित रहते हुए मर जाना' (जीवत मृत्यु) है।

#### कुंडलिनी और सुषुम्ना का खेल

साधना मार्ग में जब प्राण वायु इड़ा और पिंगला नाड़ियों को छोड़कर सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है, तब संसार के प्रति योगी की चेतना सो जाती है। बाह्य जगत के लिए वह 'मर' जाता है, और आंतरिक जगत में वह 'जाग' जाता है। कबीर इसी अवस्था को 'मरना' कहते हैं — जहाँ इंद्रियों के विषय शांत हो चुके हैं और केवल आत्मा का प्रकाश शेष है।

### 3. 'जिस मरणी से जग डरे': दो प्रकार की मृत्यु का अंतर

कबीर दो प्रकार की मृत्यु के बीच एक बहुत स्पष्ट रेखा खींचते हैं:


| साधारण मृत्यु (सांसारिक मरण) | साधना की मृत्यु (परम मरण) |

| :--- | :--- |

| यह प्रकृति के नियम के तहत मजबूरी में होती है। | यह साधक की स्वेच्छा और साधना का परिणाम है। |

| इसमें भय, पीड़ा और मोह का रोना-धोना होता है। | इसमें आनंद, शांति और परम प्रकाश होता है। |

| यह शरीर को नष्ट करती है, लेकिन वासनाओं को जीवित रखती है। | यह वासनाओं और अहंकार को नष्ट करती है, और आत्मा को अजर-अमर बनाती है। |

| इसके बाद पुनः जन्म और मरण का चक्र चलता है। | यह आवागमन के चक्र से सदा के लिए मुक्त (मोक्ष) कर देती है। |


संसार जिस मृत्यु से डरता है, वह शरीर का छूटना है। योगी जिस मृत्यु का स्वागत करता है, वह भ्रम और अज्ञान का मिटना है। जब भ्रम मिटता है, तो जो बचता है वह है — **पूरन परमानंद**।

### 4. 'जीवन्मुक्त': जीवित रहते हुए मरने की कला

भारतीय दर्शन में एक शब्द आता है — *जीवन्मुक्त*। इसका अर्थ है वह व्यक्ति जो शरीर में रहते हुए भी शरीर के बंधनों से मुक्त हो चुका है।

'मरो रे जोगी मरो' दरअसल जीवन्मुक्त होने का निमंत्रण है।

 * **अहंकार का विसर्जन:** जब तक व्यक्ति में 'मैं कर्ता हूँ' का भाव है, तब तक वह कर्मों के बंधन में बँधता रहता है। जैसे ही वह अपने इस छद्म रूप को मार देता है और यह स्वीकार कर लेता है कि 'सब कुछ परम चेतना ही कर रही है', वह मुक्त हो जाता है।

 * **इच्छाओं की समाप्ति:** कबीर का मानना है कि जब तक हमारे भीतर किसी चीज़ को पाने या खोने की इच्छा जीवित है, तब तक हम वास्तव में जीवित नहीं हैं, बल्कि अपनी इच्छाओं के गुलाम हैं। इच्छाओं की मृत्यु ही वास्तविक जीवन की शुरुआत है।

### 5. आधुनिक संदर्भ में कबीर के इस पद का अर्थ

आज का मनुष्य 21वीं सदी में जी रहा है। उसके पास तकनीक है, भौतिक सुख-सुविधाएँ हैं, लेकिन साथ ही तनाव, अवसाद, अकेलापन और असीमित चिंताएँ भी हैं। ऐसे समय में 'मरो रे जोगा मरो' की वाणी हमारे लिए किस तरह प्रासंगिक है?

 1. **मानसिक डिटॉक्स (Psychological Death):** आज के संदर्भ में 'मरने' का अर्थ है अपने पुराने विचारों, पूर्वाग्रहों, ईर्ष्या, और दूसरों से तुलना करने की आदत को मारना। हर दिन अपने भीतर की नकारात्मकता को मारना ही आधुनिक योग है।

 2. **सोशल मीडिया और 'दिखावे' के अहंकार से मुक्ति:** आज हर व्यक्ति अपनी एक कृत्रिम छवि (Digital Identity) बनाने में लगा है। कबीर कहते हैं कि इस झूठी छवि को मरने दो। जो तुम वास्तव में हो, उसमें टिको।

 3. **स्वीकार भाव (Acceptance):** जब हम यह समझ लेते हैं कि हमारा नियंत्रण केवल हमारे प्रयासों पर है, परिणामों पर नहीं, तो हम अपनी इच्छाओं के प्रति 'मर' जाते हैं और एक गहरे समर्पण भाव में प्रवेश करते हैं।

### 6. निष्कर्ष: मरण नहीं, यह तो अमृत का द्वार है

कबीरदास जी की वाणी कभी भी निराशावादी नहीं रही। वे जीवन के परम प्रेमी थे। लेकिन वे जानते थे कि जब तक झूठा जीवन (अहंकार और अज्ञान) समाप्त नहीं होगा, तब तक सच्चा जीवन (आनंद और सत्य) प्रकट नहीं हो सकता।

'मरो रे जोगी मरो' केवल योगियों के लिए कोई गूढ़ साधना का निर्देश नहीं है, बल्कि यह हर उस इंसान के लिए एक जगाने वाली पुकार है जो सांसारिक दुखों से ऊपर उठकर सच्चा आनंद पाना चाहता है।

मरना सीखो — ताकि तुम सचमुच जी सको।

अहंकार को मिटना सीखो — ताकि तुम अनंत से जुड़ सको।

यही कबीर का संदेश है, यही योग का सार है, और यही 'परमानंद' की कुंजी है।

Tags

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

This Website is made for Holy Purpose to Spread Spiritual Fragrance Everywhere.

एक टिप्पणी भेजें (0)
To Top