आनापानसति ध्यान

Shyam Nivas
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 आनापानसति (Anapanasati) ध्यान साधना का एक ऐसा स्वर्ण सेतु है जो मनुष्य के भटकते हुए चित्त को उसकी अंतरात्मा के शांत तट से जोड़ता है। 'आनापानसति' शब्द पाली भाषा का है, जो तीन मूल शब्दों के संयोजन से बना है:

 * आना (Ana): अंदर आती हुई सांस (उच्छ्वास)

 * अपान (Apana): बाहर जाती हुई सांस (प्रश्वास)

 * सति (Sati): सजगता, होश या स्मृति

सरल शब्दों में, अपनी स्वाभाविक और प्राकृतिक सांसों के आवागमन के प्रति निरंतर सजग और जागरूक रहना ही 'आनापानसति योग ध्यान' है।

यह साधना न तो कोई मंत्र जाप है, न ही इसमें किसी रूप या आकृति का कल्पना-चित्र बनाना होता है। इसमें सांसों को रोकने (प्राणायाम) की भी आवश्यकता नहीं होती। जैसी भी सांस आ रही है या जा रही है—चाहे वह गहरी हो या उथली, तेज हो या धीमी—उसे बिना किसी छेड़छाड़ के, केवल एक तटस्थ साक्षी (Observe) की भांति देखना ही इस ध्यान का मूल मंत्र है।

आनापानसति के 16 चरण (सतिपट्ठान सूत्त के अनुसार)

महात्मा बुद्ध द्वारा प्रतिपादित इस साधना को मुख्य रूप से 4 श्रेणियों (चार अनुपश्यना) और 16 चरणों में विभाजित किया गया है:

1. कायानुपश्यना (शरीर का अनुभव)

 * दीर्घ सांस: सांस लंबी आ-जा रही है, तो उसकी लंबाई के प्रति जागरूक रहना।

 * ह्रस्व सांस: सांस छोटी है, तो उसकी लघुता को जानना।

 * सकल काय संवेदी: सांस के माध्यम से पूरे शरीर के संवेदन को महसूस करना।

 * काय संस्कार प्रश्रब्धि: सांस के माध्यम से शरीर की समस्त उत्तेजनाओं और तनाव को शांत करना।

2. वेदनानुपश्यना (संवेदनाओं का अनुभव)

5. प्रीति का अनुभव: ध्यान गहरा होने पर उत्पन्न होने वाले आनंद (Joy) को महसूस करना।

6. सुख का अनुभव: शरीर और मन में छाई असीम शांति और सुख का बोध।

7. चित्त संस्कार संवेदी: मन में उठने वाली भावनाओं और विचारों के प्रभाव को देखना।

8. चित्त संस्कार प्रश्रब्धि: मानसिक उथल-पुथल को सांसों के जरिए शांत करना।

3. चित्तानुपश्यना (मन की अवस्थाओं का बोध)

9. चित्त संवेदी: मन की वर्तमान अवस्था (राग, द्वेष, एकाग्रता या भटकाव) को जानना।

10. अभिप्रमोदयन: चित्त को आनंदित और प्रफुल्लित करना।

11. समादहन: मन को सांस के केंद्र पर पूरी तरह एकाग्र (समाहित) करना।

12. विमोचयन: मन को बंधनों और अनावश्यक विचारों से मुक्त करना।

4. धम्मानुपश्यना (परम सत्य का अनुभव)

13. अनित्यानुपश्यना: यह देखना कि हर सांस, विचार और संवेदना क्षणभंगुर (अनित्य) है।

14. विरागानुपश्यना: आसक्ति और तृष्णा का क्षय होना।

15. निरोधनुपश्यना: दुखों और मानसिक क्लेशों के अंत का अनुभव।

16. पटिनिसग्गानुपश्यना: पूर्ण समर्पण, अहंकार का विसर्जन और परम मुक्ति।

आनापानसति ध्यान करने की सरल विधि

 * स्थान और आसन: किसी शांत वातावरण का चुनाव करें। सुखासन, पद्मासन या कुर्सी पर रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर आराम से बैठें।

 * हाथों की मुद्रा: हाथों की उंगलियों को आपस में फंसाकर (Clasp) अपनी गोद में रखें और आंखों को कोमलता से बंद कर लें।

 * सांसों पर ध्यान: अपना पूरा ध्यान नाक के छिद्रों के पास सांस के स्पर्श पर केंद्रित करें। सांस को खींचने या छोड़ने की कोशिश न करें; इसे स्वाभाविक बहने दें।

 * विचार आने पर: यदि मन में विचार आएं, तो उनसे लड़ें नहीं। विचारों को बहने दें और पुनः अपना ध्यान आती-जाती सांस पर ले आएं।

आनापानसति के मुख्य लाभ

| क्षेत्र | प्राप्त होने वाले लाभ |

|---|---|

| मानसिक (Mental) | मानसिक तनाव, चिंता (Anxiety) और अवसाद से मुक्ति; एकाग्रता और निर्णय क्षमता में वृद्धि। |

| शारीरिक (Physical) | उच्च रक्तचाप पर नियंत्रण, अनिद्रा (Insomnia) से राहत और प्रतिरक्षा प्रणाली (Immunity) में सुधार। |

| आध्यात्मिक (Spiritual) | आत्म-साक्षात्कार, आंतरिक शांति, और समता (Equanimity) के भाव का विकास। |


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