भज गोविंदम्

Shyam Nivas
0

 मोहनिद्रा से आत्मबोध की यात्रा: 'भज गोविंदम्' का कालजयी संदेश

प्रस्तावना: मोहमुद्गर का आघात

सनातन अध्यात्म के इतिहास में आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य का नाम एक ऐसे प्रखर दार्शनिक के रूप में दर्ज है, जिन्होंने अद्वैत वेदांत की कठिनतम गुथियों को 'विवेकचूड़ामणि' और 'ब्रह्मसूत्र भाष्य' जैसे ग्रंथों से सुलझाया। परंतु, उसी मनीषी ने जब जन-सामान्य के मोह और अज्ञान को दूर करने के लिए अपनी वाणी उठाई, तो 'भज गोविंदम्' (जिसे 'मोहमुद्गर' भी कहा जाता है) का जन्म हुआ।

'मोहमुद्गर' का शाब्दिक अर्थ है—मोह रूपी अज्ञान को नष्ट करने वाला हथौड़ा। यह रचना कोई केवल स्तुति या भजन नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना पर किया गया एक आध्यात्मिक प्रहार है जो सांसारिक भ्रम, अहंकार और जीवन की नश्वरता के प्रति मनुष्य की आँखें खोलता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उत्पत्ति की कथा

कहा जाता है कि जगद्गुरु शंकराचार्य अपने शिष्यों के साथ काशी की गलियों से गुज़र रहे थे। वहाँ उन्होंने एक अत्यंत वृद्ध विद्वान को देखा, जो व्याकरण के कठिन सूत्रों (जैसे 'डुकृञ्करणे' नियम) को रटने में लीन था।

वृद्ध व्यक्ति जीवन के अंतिम पड़ाव पर था, परंतु उसका ध्यान ईश्वर-भक्ति या आत्म-कल्याण के बजाय केवल पांडित्य प्रदर्शन और शाब्दिक ज्ञान पर केंद्रित था। इस दृश्य को देखकर शंकराचार्य का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने उसी क्षण उस वृद्ध विद्वान को संबोधित करते हुए कहा:

भज गोविंदं भज गोविंदं गोविंदं भज मूढमते। संप्राप्ते सन्निहिते काले न हि न हि रक्षति डुकृञ्करणे॥

(हे मूढ बुद्धि वाले जीव! गोविंद का भजन कर, गोविंद का स्मरण कर। जब जीवन का अंतिम समय निकट आएगा, तब यह व्याकरण का रटना या केवल शाब्दिक ज्ञान तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाएगा।)

इसके बाद शंकराचार्य और उनके 14 शिष्यों ने मिलकर श्लोकों की एक श्रृंखला रची, जिसे आज हम 'भज गोविंदम्' के नाम से जानते हैं।

'भज गोविंदम्' के मुख्य दार्शनिक स्तंभ

यह रचना केवल मृत्यु का भय दिखाने वाली नहीं है, बल्कि यह जीवन को सही परिप्रेक्ष्य में जीने का सूत्र प्रदान करती है। इसके मुख्य विषयों को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:

1. जीवन की क्षणभंगुरता (नश्वरता का बोध)

मानव जीवन जल की उस बूंद के समान है जो कमल के पत्ते पर टिकी होती है और हवा का एक झोंका उसे किसी भी क्षण गिरा सकता है। शंकराचार्य कहते हैं:

नलिनीदलगतजलमतितरलं तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्।

हम धन, पद, रूप और संपत्ति का अहंकार करते हैं, परंतु काल (समय) निरंतर सब कुछ निगल रहा है। युवावस्था देखते-देखते ढल जाती है, शरीर जर्जर हो जाता है और जिन्हें हम अपना कहते हैं, वे ही अंत में देह को अग्नि के हवाले कर देते हैं।

2. धन और तृष्णा का भ्रम

संसार में अधिकांश दुखों का कारण अनियंत्रित तृष्णा और धन का मोह है। शंकराचार्य स्पष्ट चेतावनी देते हैं:

अर्थमनर्थं भावय नित्यं नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम्। पुत्रादपि धनभाजां भीतिः सर्वत्रैषा विहिता रीतिः॥

अर्थात् धन अनर्थ का मूल है। इससे रत्ती भर भी सच्चा सुख नहीं मिलता। धनवान व्यक्ति को तो अपने पुत्र से भी भय रहता है कि कहीं वह उसकी संपत्ति न छीन ले। अतः धन संग्रह को जीवन का उद्देश्य मानने की भूल न करें।

3. संबंधों की नग्न सच्चाई

जब तक शरीर में प्राण हैं और व्यक्ति कमाने योग्य है, तब तक परिवार और समाज उसे प्रेम करता है। लेकिन जैसे ही प्राण पखेरू उड़ जाते हैं, वही प्रियजन उस देह को 'शव' कहकर दूर हटाने में लग जाते हैं।

यह कोई निराशावादी विचार नहीं है, बल्कि यह सत्य का स्वीकार है ताकि मनुष्य कल्पित और नश्वर संबंधों के मोह में फंसकर अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को न भूले।

व्यावहारिक जीवन के लिए भज गोविंदम् के जीवन-मंत्र

'भज गोविंदम्' केवल संन्यासियों के लिए नहीं है, यह गृहस्थों और युवाओं के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है:

श्लोक की सीखव्यावहारिक जीवन में प्रयोग
सत्संगत्वे निस्सङ्गत्वम्अच्छी संगति से आसक्ति घटती है, जिससे मानसिक शांति मिलती है।
मा कुरु धनजनयौवनगर्वम्धन, सौंदर्य और शक्ति का अहंकार न करें; समय इन्हें छिनने में देर नहीं लगाता।
कस्ते कान्ता कस्ते पुत्रःरिश्तों में प्रेम रखें, लेकिन उनमें अंधा मोह और स्वामित्व का भाव न रखें।
संतोषादेव सुखम्अपने पुरुषार्थ से जो प्राप्त हो, उसी में संतोष पाकर ईश्वर को समर्पित करें।

'भज गोविंदम्' की मनोवैज्ञानिक प्रासंगिकता (आधुनिक परिप्रेक्ष्य)

आज के 21वीं सदी के दौर में, जहाँ मानसिक तनाव, डिप्रेशन, और प्रतिस्पर्द्धा (Rat Race) अपनी चरम सीमा पर हैं, 'भज गोविंदम्' एक थेरेपी का कार्य करता है:

  1. ओवरथिंकिंग (Overthinking) से मुक्ति: जब हम स्वीकार कर लेते हैं कि बाहरी परिस्थितियां और वस्तुएं स्थायी नहीं हैं, तो अनिश्चितता का भय समाप्त होने लगता है।
  2. भौतिकतावाद (Materialism) पर नियंत्रण: यह ग्रंथ हमें याद दिलाता है कि ब्रांडेड वस्तुएं, महंगे घर और सामाजिक प्रतिष्ठा अंतिम शांति नहीं दे सकते। आंतरिक शांति केवल आत्म-साक्षात्कार और भक्ति से आती है।
  3. सत्य का स्वीकार: मृत्यु और परिवर्तन को जीवन का अनिवार्य हिस्सा मानकर स्वीकार करने से मन में सजगता (Mindfulness) आती है।


1. मंगलाचरण और मूल संदेश (ध्रुवपद)

भज गोविंदं भज गोविंदं गोविंदं भज मूढमते। संप्राप्ते सन्निहिते काले न हि न हि रक्षति डुकृञ्करणे॥1॥

  • हिंदी अर्थ: हे मूढ़ बुद्धि वाले मनुष्य! गोविंद का भजन कर, गोविंद का स्मरण कर, गोविंद की भक्ति में मन लगा। जब मृत्यु का अंतिम समय निकट आएगा, तब केवल व्याकरण के नियम रटना या पांडित्य प्रदर्शन तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाएगा।
  • व्याख्या: यह इस ग्रंथ का केंद्रीय श्लोक है। यहाँ शंकराचार्य शाब्दिक ज्ञान (bookish knowledge) और केवल बौद्धिक बहस की सीमाओं को उजागर करते हैं। वे समझाते हैं कि जीवन का अंतिम उद्देश्य केवल जानकारी इकट्ठा करना नहीं, बल्कि परम सत्य (गोविंद) को महसूस करना और उसमें लीन होना है।

2. धन और तृष्णा का भ्रम

मूढ जहीहि धनागमतृष्णां कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम्। यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम्॥2॥

  • हिंदी अर्थ: हे मूढ़! धन पाने की असीम तृष्णा का त्याग कर। अपने मन को शुद्ध और तृष्णारहित बना। अपने सत्य और ईमानदारी के कर्म से जो कुछ भी प्राप्त हो, उसी में संतोष मानकर अपने चित्त को आनंदित रख।
  • व्याख्या: इस श्लोक में अनियंत्रित लोभ और धन-संग्रह की अंधी दौड़ पर प्रहार किया गया है। शंकराचार्य कर्म का विरोध नहीं करते, बल्कि अन्यायपूर्वक अर्जित धन और अनंत इच्छाओं के दास बनने का विरोध करते हैं। सच्चा सुख 'प्राप्ति' में नहीं, बल्कि 'संतोष' में है।

3. सांसारिक आकर्षण की क्षणभंगुरता

नारीस्तनभरनाभीदेशं दृष्ट्वा मा गा मोहावेशम्। एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विभावय वारं वारम्॥3॥

  • हिंदी अर्थ: शारीरिक सौंदर्य और आकर्षण को देखकर मोह-पाश में मत बँधो। यह शरीर केवल मांस, मज्जा, वसा और रुधिर का विकार मात्र है—इस सत्य का अपने मन में बार-बार विचार करो।
  • व्याख्या: यह श्लोक काम वासना और शारीरिक आसक्ति के मोहभंग के लिए विवेक जागृत करता है। शंकराचार्य यहाँ वैराग्य की दृष्टि देते हैं कि जिस भौतिक देह के प्रति मनुष्य अंधा हो जाता है, उसकी आंतरिक संरचना केवल क्षणभंगुर तत्वों से बनी है।

4. जीवन की अनिश्चितता

नलिनीदलगतजलमतितरलं तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्। विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं लोकं शोकहतं च समस्तम्॥4॥

  • हिंदी अर्थ: कमल के पत्ते पर टिकी जल की बूंद अत्यंत चंचल (अस्थिर) होती है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी क्षणभंगुर और चंचल है। यह समझो कि यह संपूर्ण संसार रोगों, अहंकार और शोकों से घिरा हुआ है।
  • व्याख्या: जीवन कब समाप्त हो जाए, इसका कोई भरोसा नहीं है। इस अनिश्चितता को याद दिलाकर शंकराचार्य मनुष्य को सचेत करते हैं कि वह कल पर अपने आध्यात्मिक कल्याण को न टाले।

5. स्वार्थ पर टिके सांसारिक संबंध

यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्तावन्निजपरिवारो रक्तः। पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥5॥

  • हिंदी अर्थ: जब तक मनुष्य धन कमाने में समर्थ है, तब तक परिवार के लोग उससे प्रेम और आत्मीयता जताते हैं। लेकिन जब वृद्धावस्था में शरीर जर्जर हो जाता है, तब घर का कोई भी सदस्य हाल-चाल तक नहीं पूछता।
  • व्याख्या: सांसारिक रिश्तों की व्यावहारिक और कड़वी सच्चाई को यहाँ उजागर किया गया है। अधिकांश सामाजिक संबंध स्वार्थ पर आधारित होते हैं। इसलिए, केवल नश्वर संबंधों पर निर्भर रहने के बजाय असीम ईश्वर से रिश्ता जोड़ना चाहिए।

6. जीवन के तीन पड़ाव और अज्ञान

बालस्तावत्क्रीडासक्तस्तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः। वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः॥7॥

  • हिंदी अर्थ: बाल्यावस्था खेल-कूद में बीत जाती है, युवावस्था स्त्री/पुरुष के आकर्षण में निकल जाती है, और वृद्धावस्था चिंताओं से घिरी रहती है। परंतु, परम ब्रह्म (ईश्वर) में किसी का मन नहीं लगता।
  • व्याख्या: मनुष्य अपने पूरे जीवन चक्र में किसी न किसी व्यामोह में फँसा रहता है और सोचता है कि बुढ़ापे में भक्ति करेगा। लेकिन बुढ़ापे में चिंताएं और रोग घेर लेते हैं। अतः भक्ति और आत्म-चिंतन की शुरुआत जीवन के हर पड़ाव में होनी चाहिए।

7. आत्म-विचार (Who am I?)

कस्ते कान्ता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः। कस्य त्वं कः कुतो आयातः तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः॥8॥

  • हिंदी अर्थ: कौन तुम्हारी पत्नी है? कौन तुम्हारा पुत्र है? यह संसार अत्यंत विचित्र और रहस्यमय है। तुम किसके हो? तुम कहाँ से आए हो? हे भाई! इस परम सत्य का विचार करो।
  • व्याख्या: यह श्लोक वेदांत के आत्म-जिज्ञासा (Self-Inquiry) के विचार को प्रस्तुत करता है। सांसारिक रिश्तों की पहचान से परे हटकर अपनी वास्तविक पहचान और जीवन के मूल उद्देश्य पर विचार करने का संदेश दिया गया है।

8. मोक्ष का सोपान (सत्संगति की महिमा)

सत्संगत्वे निस्सङ्गत्वं निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम्। निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः॥9॥

  • हिंदी अर्थ: श्रेष्ठ पुरुषों की संगति (सत्संग) से आसक्ति का नाश (निःसंगता) होता है। आसक्ति नष्ट होने से मोह समाप्त होता है। मोह नष्ट होने से चित्त में निश्चल तत्त्व (स्थिरता) आता है और चित्त की स्थिरता से जीवनमुक्ति (मोक्ष) प्राप्त होती है।
  • व्याख्या: यह श्लोक मोक्ष की यात्रा का चरणबद्ध मानचित्र (roadmap) प्रदान करता है: \text{सत्संग} \longrightarrow \text{अनासक्ति} \longrightarrow \text{निर्मोहता} \longrightarrow \text{स्थिर बुद्धि} \longrightarrow \text{मुक्ति}

9. धन का वास्तविक अनर्थ

अर्थमनर्थं भावय नित्यं नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम्। पुत्रादपि धनभाजां भीतिः सर्वत्रैषा विहिता रीतिः॥29॥

  • हिंदी अर्थ: धन को सदैव अनर्थ का कारण समझो। इसमें तनिक भी वास्तविक सुख नहीं है, यह परम सत्य है। अत्यधिक धनवान व्यक्ति को अपने पुत्रों से भी भय बना रहता है, यह सब जगह देखा गया है।
  • व्याख्या: धन मनुष्य को सुरक्षा का भ्रम देता है, लेकिन अत्यधिक धन-मोह भय, शंका और पारिवारिक कलह का कारण बनता है। यह श्लोक बाह्य संपदा के बजाय आंतरिक संपदा (शांति) जुटाने की प्रेरणा देता है।

10. शरणागति और आत्म-कल्याण

भगवद्गीता किंचिदधीता गंगाजललवकणिका पीता। सकृदपि येन मुरारिसमर्चा क्रियते तस्य यमेन न चर्चा॥21॥

  • हिंदी अर्थ: जिसने श्रीमद्भगवद्गीता का थोड़ा भी अध्ययन किया है, जिसने गंगाजल की एक बूंद भी आचमन की है, और जिसने एक बार भी भगवान श्रीकृष्ण (मुरारि) की सच्चे मन से पूजा की है, यमराज भी उससे चर्चा (दंड विधान) नहीं करते।
  • व्याख्या: यहाँ शंकराचार्य अत्यंत करुणा के साथ भक्ति का सुगम मार्ग दिखाते हैं। वे कहते हैं कि बहुत कठिन साधना न सही, यदि कोई श्रद्धा और भक्ति भाव से ईश्वर की शरण में थोड़ा भी प्रयास करता है, तो उसका उद्धार निश्चित है।

निष्कर्ष: गोविंद का वास्तविक अर्थ
यहाँ 'गोविंद' केवल किसी एक रूप या नाम का संकीर्ण सूचक नहीं है। 'गो' का अर्थ है इन्द्रियाँ, वाणी और वेद। 'विन्दति' का अर्थ है जानने वाला या प्राप्त करने वाला।

अतः गोविंद का अर्थ है—वह परम चेतना जो सभी इन्द्रियों का संचालन करती है और जो वेदों का अंतिम ज्ञान (अद्वैत) है।

'भज गोविंदम्' का अंतिम संदेश यही है कि ज्ञान को केवल शास्त्रों में मत खोजो, उसे अपने आचरण में उतारो। जीवन की नश्वरता को समझकर आज, इसी क्षण, उस परम सत्य (गोविंद) से जुड़ने का प्रयास करो।

'भज गोविंदम्' (मोहमुद्गर) के ये 10 प्रमुख श्लोक मानव जीवन की नश्वरता, मोह-माया के स्वरूप और आत्म-कल्याण के मार्ग को अत्यंत स्पष्टता से रेखांकित करते हैं।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

This Website is made for Holy Purpose to Spread Spiritual Fragrance Everywhere.

एक टिप्पणी भेजें (0)
To Top