मीराबाई

Shyam Nivas
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 # प्रेम और भक्ति की अमर पराकाष्ठा: संत शिरोमणि मीराबाई और उनका श्री कृष्ण अनुराग



भारतीय आध्यात्मिक चेतना और भक्तिकाल के सुनहरे इतिहास में संत मीराबाई का नाम एक ऐसी जगमगाती लौ की तरह है, जिसकी पावन ज्योति सदियों बाद भी जन-जन के मन को भक्ति और आनंद से सराबोर कर देती है। 16वीं शताब्दी में राजस्थान की राजपूती मर्यादाओं और सामंती बंदिशों के बीच पली-बढ़ी एक राजकुमारी जब राजमहलों के ऐश्वर्य को ठुकराकर एक साधारण साध्वी का वेश धारण कर लेती है, तो वह केवल एक परंपरा का त्याग नहीं करती, बल्कि आत्म-साक्षात्कार और ईश्वर-प्रेम का एक नया मार्ग प्रशस्त करती है।

मीराबाई का श्री कृष्ण के प्रति प्रेम केवल सामान्य पूजा-अर्चना या भक्ति तक सीमित नहीं था; यह आत्मा का परमात्मा के साथ वह अनन्य मिलन था, जहाँ प्रेमी और प्रियतम के बीच की हर दूरी मिट जाती है। उनके लिए कृष्ण कोई पत्थर की मूर्ति या पौराणिक कथा के नायक मात्र नहीं थे, बल्कि वे उनके जीवन की एकमात्र सांस, उनके साक्षात स्वामी और पति थे।

## 1. मीराबाई का जन्म और प्रारंभिक जीवन

मीराबाई का जन्म संवत 1555 (लगभग 1498 ईस्वी) के आसपास मेड़ता (राजस्थान) के कुड़की गाँव में हुआ था। वे राठौड़ वंश के राव रतन सिंह की इकलौती पुत्री थीं। बचपन में ही माता का साया सिर से उठ जाने के कारण उनका पालन-पोषण उनके दादा राव दूदा जी के पास मेड़ता में हुआ। राव दूदा जी स्वयं परम वैष्णव भक्त थे, जिसके कारण मीराबाई को बचपन से ही घर में धार्मिक वातावरण, संतों की संगति और हरि-कीर्तन के संस्कार मिले।

### बालमन पर पड़ा अमर प्रभाव

मीराबाई के जीवन में कृष्ण-प्रेम का बीजारोपण बाल्यावस्था की एक अत्यंत सरल परंतु दूरगामी घटना से हुआ। एक बार उनके घर के पास से किसी सेठ जी के बेटे की बारात निकल रही थी। बारात के ढोल-नगाड़ों और सुंदर वस्त्रों में सजे दूल्हे को देखकर बाल्यावस्था की उत्सुकता में मीरा ने अपनी माता से पूछा, *"माँ, मेरा दूल्हा कौन है?"*

माता ने सहज स्नेह और विनोद भाव में गृह-मंदिर में रखी भगवान श्री कृष्ण की सुंदर 'गिरधर गोपाल' की प्रतिमा की ओर इशारा करते हुए कह दिया, *"बेटी, तेरे दूल्हा तो ये गिरधर गोपाल ही हैं।"*

बालिका मीरा ने अपनी माँ के इन शब्दों को केवल एक उत्तर नहीं माना, बल्कि उन्हें अपने हृदय की अंतरात्मा में सदा के लिए अंकित कर लिया। उसी क्षण से उन्होंने श्री कृष्ण को अपना वास्तविक पति और सर्वस्व स्वीकार कर लिया। वे बाल-सुलभ क्रीड़ाओं को छोड़कर दिन-रात उस सांवली सूरत वाली मूर्ति से बातें करतीं, उसे नहलातीं, सजातीं और उसके सामने नृत्य करतीं।

## 2. मेवाड़ का राजमहल और अलौकिक संघर्ष

जैसे-जैसे मीराबाई बड़ी हुईं, उनका कृष्ण के प्रति अनुराग गहराता गया। परंतु सामंती समाज की अपनी मर्यादाएँ थीं। मीरा का विवाह मेवाड़ के पराक्रमी महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र युवराज भोजराज के साथ तय कर दिया गया।

### विवाह और वैवाहिक जीवन

विवाह के समय भी मीराबाई का मन पूरी तरह श्री कृष्ण के चरणों में ही लीन था। परंपरा अनुसार जब वे विदा होकर चित्तौड़गढ़ के राजमहल पहुँचीं, तो अपने साथ उसी 'गिरधर गोपाल' की मूर्ति को ले गईं, जिसे वे बचपन से पूजती आ रही थीं।

राणा परिवार की कुलदेवी 'तुलजा भवानी' (दुर्गा जी) थीं। जब मीराबाई को कुलदेवी के समक्ष सिर झुकाने और उनकी पूजा करने को कहा गया, तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। मीरा ने स्पष्ट कहा कि उनका मस्तक केवल उनके गिरधर नागर के चरणों में ही झुक सकता है। इस घटना ने राजमहल के रूढ़िवादी लोगों के दिलों में मीरा के प्रति असंतोष का बीज बो दिया।

युवराज भोजराज ने मीरा के आध्यात्मिक भाव को समझने का प्रयास किया और उन्हें अपने महल में कृष्ण-पूजा की छूट दी। किंतु दुर्भाग्यवश, विवाह के कुछ ही वर्षों पश्चात युद्ध के घावों के कारण युवराज भोजराज का असमय निधन हो गया।

## 3. विष से अमृत बनने की गाथा: परीक्षाओं का दौर

पति की मृत्यु के बाद सामंती परंपराओं के अनुसार मीराबाई पर सती होने का दबाव बनाया गया, किंतु मीरा ने निर्भीकता से कहा:

> **"मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।"**

जब उनके वास्तविक स्वामी अविनाशी श्री कृष्ण जीवित हैं, तो वे किसके साथ सती हों? पति की मृत्यु के बाद चित्तौड़ की गद्दी पर विक्रमादित्य बैठा, जो मीरा की भक्ति, साधु-संतों की संगति और सार्वजनिक रूप से मंदिरों में नाचे-गाने को राजघराने की मर्यादा के विरुद्ध मानता था। मीरा को समाप्त करने और उनकी भक्ति को तोड़ने के लिए कई षड्यंत्र रचे गए।

### 1. विष का प्याला (विष पीवत मीराँ नाची रे)

राणा ने मीरा को मारने के लिए एक चरणामृत के नाम पर तीव्र विष (ज़हर) से भरा प्याला भेजा। मीराबाई जानती थीं कि इसमें क्या है, फिर भी उन्होंने अपने प्रभु श्री कृष्ण का नाम लेकर हंसते-हंसते वह विष पी लिया। भगवान कृष्ण की कृपा से वह विष भी मीरा के शरीर में जाकर अमृत बन गया और उनका बाल भी बांका न हुआ।

### 2. पिटारे में विषैला सर्प

राणा ने एक पिटारे में अत्यंत विषैला काला नाग बंद करके मीरा के पास भेजा और संदेश दिलवाया कि इसमें आपके लिए कीमती फूलों की माला या हार है। मीराबाई ने जब "श्री कृष्ण" का स्मरण करते हुए पिटारा खोला, तो उसमें से विषैले नाग की जगह एक अति सुंदर और सुगंधित शालिग्राम जी की प्रतिमा या पुष्पहार निकला।

### 3. कांटों की सेज

मीराबाई के लिए कांटों से भरी सेज (बिस्तर) बिछाई गई। परंतु जब मीरा उस पर विश्राम करने गईं, तो कृष्ण-कृपा से वे नुकीले कांटे अत्यंत कोमल और सुगंधित गुलाब के फूलों में परिवर्तित हो गए।

इन चमत्कारों ने सिद्ध कर दिया कि जहाँ सच्चा निष्काम प्रेम और ईश्वर पर अडिग विश्वास होता है, वहाँ प्रकृति के नियम भी भक्त की रक्षा के लिए बदल जाते हैं।

## 4. मीराबाई की भक्ति का स्वरूप: कांता भाव और माधुर्य भाव

भारतीय भक्ति परंपरा में नौ प्रकार की भक्ति (नवधा भक्ति) का वर्णन मिलता है। मीराबाई की भक्ति **'माधुर्य भाव'** या **'कांता भाव'** की पराकाष्ठा है।

 * **पति-पत्नी का संबंध:** इस भाव में भक्त ईश्वर को अपने पति, स्वामी और प्रियतम के रूप में देखता है। मीराबाई ने कृष्ण को किसी दूर बैठे भगवान के रूप में नहीं, बल्कि अपने निकटतम जीवनसाथी के रूप में अनुभव किया।

 * **दास्य और समर्पण भाव:** प्रेम के साथ-साथ उनके पदों में अनन्य दैन्य और समर्पण भाव भी दिखता है। वे कृष्ण की दासी बनकर उनके महल के आंगन में झाड़ू लगाने और बागीचे लगाने को भी तैयार हैं:

   > *"स्याम मने चाकर राखो जी,*

   > *गिरधारी लाल मने चाकर राखो जी।*

   > *चाकर रहसूँ बाग लगासूँ नित उठ दरसण पासूँ।"*

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 * **विरह की अग्नि:** मीरा के साहित्य और काव्य में विरह (वियोग) की वेदना बहुत गहरी है। कृष्ण के दर्शन न मिलने की तड़प उनके पदों में स्पष्ट झलकती है:

   > *"हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दर्द न जाणे कोय।"*

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## 5. गुरु रविदास (रैदास) का मार्गदर्शन

मीराबाई की भक्ति यात्रा में संत रविदास (रैदास जी) का महत्वपूर्ण योगदान रहा। यद्यपि मीरा राजघराने की क्षत्रियाणी थीं और संत रविदास जी समाज के शोषित वर्ग से आते थे, फिर भी मीरा ने जाति-पात और कुल के अभिमान को दूर फेंककर उन्हें अपना गुरु बनाया।

गुरु रैदास से दीक्षा लेने के बाद मीरा की साधना को एक नई वैचारिक और आध्यात्मिक दिशा मिली। उन्होंने स्वयं अपने पदों में स्वीकार किया है:

> *"गुरु मिलिया रैदास दीन्हीं ज्ञान की गुटकी।"*

यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि भक्ति के मार्ग पर जाति, वर्ण या लिंग का कोई भेद नहीं होता; केवल भाव और निष्ठा ही सर्वोपरि है।

## 6. वृंदावन और द्वारका की यात्रा: अंतिम मिलन

राजमहल की प्रताड़नाओं से मुक्त होकर मीराबाई ने सांसारिक बंधनों को पूरी तरह काट दिया और वृंदावन की ओर प्रस्थान किया।

### जीव गोस्वामी के साथ प्रसंग

वृंदावन में एक प्रसिद्ध प्रसंग आता है कि जब मीराबाई महान गौड़ीय वैष्णव संत जीव गोस्वामी जी से मिलने गईं, तो गोस्वामी जी के शिष्यों ने यह कहकर मना कर दिया कि वे किसी स्त्री से नहीं मिलते।

इस पर मीराबाई ने अत्यंत सहज और गूढ़ उत्तर दिया:

> *"मैंने तो सोचा था कि इस संसार में केवल एक ही पुरुष हैं — 'श्री कृष्ण'। बाकी हम सब तो उनकी गोपियाँ हैं। आज पता चला कि वृंदावन में कृष्ण के अलावा भी कोई दूसरा पुरुष है!"*

यह सुनकर जीव गोस्वामी जी की आँखें खुल गईं। वे नंगे पाँव दौड़ते हुए आए और मीराबाई के चरणों में प्रणाम कर उनसे क्षमा मांगी।

### द्वारका में सायुज्य मुक्ति

वृंदावन में कुछ समय बिताने के बाद मीराबाई गुजरात के **द्वारका** चली गईं। वहाँ वे रणछोड़ जी (श्री कृष्ण) के मंदिर में अपने घुँघरू बांधकर दिन-रात नाचती और गाती थीं।

संवत 1603 (लगभग 1546 ईस्वी) के आसपास, जब मेवाड़ पर विपत्तियां आने लगीं, तो चित्तौड़ के राजा ने मीराबाई को वापस लाने के लिए पुरोहितों को भेजा। पुरोहितों ने मंदिर में धरणा दे दिया। मीराबाई ने अपने प्रभु रणछोड़ जी की मूर्ति के सम्मुख बैठकर अंतिम बार गाया:

> *"हरि तुम हरो जन की भीर..."*

गाते-गाते मीराबाई भाव-समाधि में चली गईं। कहा जाता है कि मंदिर के कपाट स्वयं बंद हो गए और जब कपाट खोले गए, तो मीराबाई वहाँ भौतिक रूप से मौजूद नहीं थीं। उनके शरीर का वस्त्र श्री कृष्ण की मूर्ति से लिपटा हुआ था। मीराबाई अपने प्रियतम श्री कृष्ण की प्रतिमा में ही सशरीर लीन हो गई थीं।

## 7. मीराबाई के काव्य की भाषा और विशेषताएं

मीराबाई ने कोई औपचारिक ग्रंथ नहीं लिखा, परंतु उनके मुख से निकले भजन और पद ही साहित्य की अमूल्य धरोहर बन गए।


| विशेषता | विवरण |

| :--- | :--- |

| **मुख्य भाषा** | राजस्थानी (मारवाड़ी) मिश्रित ब्रजभाषा। कुछ पदों में गुजराती और खड़ी बोली का प्रभाव। |

| **रस** | मुख्य रूप से **श्रृंगार रस** (वियोग और संयोग) तथा **भक्ति/शांत रस**। |

| **संगीत और लय** | उनके सभी पद गेय (गाने योग्य) हैं और शास्त्रीय रागों (जैसे राग सोरठ, राग मल्हार, राग केदार) में निबंध हैं। |

| **अलंकार** | अनुप्रास, रूपक और उपमा अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग। |


## 8. नारी सशक्तिकरण और सामाजिक क्रांति का प्रतीक

16वीं शताब्दी का समाज अत्यंत रूढ़िवादी था, जहाँ महिलाओं का जीवन पर्दा प्रथा, बाल विवाह और सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों से घिरा हुआ था। ऐसे कालखंड में मीराबाई ने:

 1. **पर्दा प्रथा को तोड़ा:** उन्होंने बिना किसी भय के सार्वजनिक स्थलों और मंदिरों में साधुओं के साथ कीर्तन किया।

 2. **सामंती सत्ता को चुनौती दी:** राजा या राणा के आदेश से ऊपर उन्होंने अपने अंतरात्मा और ईश्वर के विधान को रखा।

 3. **स्त्री अस्मिता की मिसाल बनीं:** उन्होंने यह साबित किया कि एक महिला का अस्तित्व केवल किसी पुरुष की संपत्ति या किसी कुल की प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं है; उसकी अपनी एक स्वतंत्र आध्यात्मिक चेतना है।

## निष्कर्ष

मीराबाई का जीवन और उनका श्री कृष्ण प्रेम केवल एक कथा नहीं, बल्कि मानव चेतना की वह सर्वोच्च अवस्था है जहाँ भय, अहंकार और स्वार्थ पूरी तरह भस्म हो जाते हैं। मीरा ने हमें सिखाया कि सच्ची भक्ति में सौदा नहीं होता, केवल पूर्ण समर्पण होता है।

आज भी जब कोई भक्त अपने घुँघरू बांधकर गाता है — *"पाजी जी मैंने राम रतन धन पायो"*, तो मीराबाई का पावन चरित्र हमारे सामने जीवंत हो उठता है। उनका जीवन युगों-युगों तक मानवता को प्रेम, भक्ति और निडरता का मार्ग दिखाता रहेगा।


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