संत लल्लेश्वरी

Shyam Nivas
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 कश्मीर की पावन भूमि पर 14वीं शताब्दी में जन्मी संत लल्लेश्वरी (जिन्हें 'लाल देद', 'लल्ला आरिफा' और 'माता लल्ला' के नाम से भी जाना जाता है) भक्ति आंदोलन, कश्मीर शैव दर्शन और कश्मीरी साहित्य की सबसे अमर स्तंभों में से एक हैं। वे केवल एक संत या कवयित्री नहीं थीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति की जननी थीं, जिन्होंने रूढ़िवादिता, बाह्य आडंबरों और सामाजिक भेदभाव को दरकिनार कर जनमानस को आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया।

प्रारंभिक जीवन और गृहस्थ जीवन का संघर्ष

संत लल्लेश्वरी का जन्म सन् 1320 (अनुमानित) के आसपास श्रीनगर के पास स्थित पांड्रेथन (प्राचीन पुराणधिष्ठान) गाँव में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनका मन आध्यात्मिक चिंतन और ईश्वर-भक्ति की ओर झुका हुआ था।

मात्र बारह वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह पम्पोर के एक परिवार में हुआ। उनका गृहस्थ जीवन अत्यंत कष्टप्रद रहा। पौराणिक आख्यानों और लोकश्रुतियों के अनुसार, उनकी सास अत्यंत क्रूर स्वभाव की थीं, जो उन्हें भोजन के नाम पर थाली में एक बड़ा पत्थर रखकर ऊपर से चावल की पतली परत से ढँक देती थीं ताकि बाहर से भोजन पर्याप्त दिखे। इसके बावजूद लल्लेश्वरी ने बिना किसी शिकायत के इस उत्पीड़न को सहा।

कहा जाता है कि एक दिन जब वे नदी से पानी भरकर मटके में ला रही थीं, तब उनके पति ने क्रोध में आकर उन पर प्रहार किया और घड़ा टूट गया। किंतु लल्ला के तपोबल से पानी जमींदोज होने के बजाय घड़े के आकार में ही ठहरा रहा। इस घटना के बाद उन्होंने गृहस्थ जीवन के बंधनों को पूरी तरह से त्याग दिया और सत्य की खोज में निकल पड़ीं।

आध्यात्मिक यात्रा और कश्मीर शैव दर्शन

घर का त्याग करने के पश्चात् लल्लेश्वरी ने सिद्ध श्रीकंठ (जिन्हें 'सेद बोय' भी कहा जाता है) को अपना गुरु माना। गुरु से प्राप्त दीक्षा और आंतरिक साधना के माध्यम से उन्होंने त्रिक शैव दर्शन (कश्मीर शैवमत) के अद्वैत सिद्धांतों को गहराई से आत्मसात किया।

कश्मीर शैव दर्शन के अनुसार:

 * शिव ही परम सत्य हैं: शिव और जीव में कोई मौलिक अंतर नहीं है; अज्ञानता का आवरण हटने पर मनुष्य स्वयं में ही शिव का साक्षात्कार करता है।

 * संसार माया नहीं, शक्ति का प्रसार है: संसार मिथ्या नहीं, बल्कि शिव की अपनी चित्-शक्ति का विलास है।

लाल देद ने वैराग्य धारण किया और ज्ञान के प्रसार हेतु गाँव-गाँव भटकने लगीं। वे शारीरिक चेतना से ऊपर उठ चुकी थीं, इसलिए वे प्रायः अनंग (नग्न या न्यूनतम वस्त्रों में) घूमती थीं। जब लोग उन पर हँसते या ताने कसते, तो वे शांत रहकर कहती थीं कि वास्तविक लज्जा वस्त्रहीन होने में नहीं, बल्कि मन की वासनाओं और अज्ञान में है।

'वाख' (Vakhs): कश्मीरी साहित्य की अमर निधि

संत लल्लेश्वरी की सबसे बड़ी देन उनके द्वारा रचित काव्य-पद हैं, जिन्हें कश्मीरी भाषा में 'वाख' (Vakh) कहा जाता है। 'वाख' चार पंक्तियों की एक स्वतंत्र काव्य शैली है, जिसमें गूढ़ दार्शनिक विचारों को सरल, लयबद्ध और मर्मस्पर्शी कश्मीरी बोली में प्रस्तुत किया गया है।

लाल देद से पूर्व कश्मीरी साहित्य और दर्शन पर संस्कृत का एकाधिकार था। लल्लेश्वरी पहली ऐसी साधिका थीं जिन्होंने दर्शन को संस्कृत के पंडितों के घेरे से निकालकर आम जनता की भाषा में प्रवाहित किया।

प्रमुख वाख और उनका भावार्थ

> अमी पना सोती रस कषण ग्याहा

> मे ति गारी नवि अथ ज़ास नावी...

> भावार्थ: "मैं कच्चे धागे से अपनी नाव (जीवन) को खींच रही हूँ। न जाने कब मेरा प्रभु मेरी पुकार सुनेगा और मुझे इस भवसागर से पार उतारेगा। कच्चे मिट्टी के बर्तन की तरह मुझमें पानी टपक रहा है, और मेरा मन अपने घर (परमात्मा) लौटने के लिए व्याकुल है।"

> शिव छु थलि थलिोज़ि मोज़ि

> मो ज़ान हिंदू ते मुसलमान...

> भावार्थ: "शिव सर्वव्यापी हैं, वे कण-कण में विद्यमान हैं। हिंदू और मुसलमान में भेद मत करो। यदि तुम वास्तव में ज्ञानी हो, तो स्वयं को पहचानो; वही परमात्मा से पहचान का सच्चा मार्ग है।"

> गोरन दोपम अकुय वचन

> नेबरो दोपम अंदर अछन...

> भावार्थ: "गुरु ने मुझे केवल एक ही शब्द (उपदेश) दिया: बाह्य जगत से ध्यान हटाकर अपने भीतर झाँको। वही उपदेश मेरे जीवन का मूल मंत्र बन गया और मैं विलीन होकर आनंदित हो गई।"

सामाजिक सुधार और धार्मिक समरसता की प्रतीक

14वीं शताब्दी का कश्मीर एक अत्यंत संवेदनशील संक्रमण काल से गुजर रहा था। इस दौर में मध्य एशिया से इस्लाम का आगमन हो रहा था और सामाजिक ताना-बाना बदल रहा था। संत लल्लेश्वरी इस संक्रमण काल में शांति, सौहार्द और मानवीय मूल्यों की संवाहक बनीं।

 * आडंबरों का खंडन: उन्होंने मूर्तिपूजा, बलि प्रथा, तीर्थयात्राओं के नाम पर होने वाले पाखंड और कठोर कर्मकांडों का मुखर विरोध किया। उनका मानना था कि पत्थर की मूर्ति पर जल चढ़ाने से बेहतर है कि मन के विकार धोए जाएँ।

 * जाति-पात का अंत: उन्होंने जन्म आधारित उच्चता को नकारते हुए आत्मज्ञान को ही एकमात्र योग्यता माना।

 * ऋषि परंपरा और सूफीवाद पर प्रभाव: लल्लेश्वरी का प्रभाव केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं रहा। कश्मीर के महान सूफी संत शेख नूर-उद्दीन वली (जिन्हें 'नंद ऋषि' कहा जाता है) लाल देद को अपनी आध्यात्मिक माता मानते थे। उनके जन्म से जुड़ी लोककथा है कि जब शिशु नंद ऋषि ने जन्म के बाद माँ का दूध पीने से इनकार कर दिया था, तब लाल देद ने उन्हें अपनी गोद में लेकर दूध पिलाया था। इस प्रकार उन्होंने कश्मीरी सूफीवाद (ऋषि संप्रदाय) की नींव रखी, जिसे आज 'कश्मीरियत' का आधार माना जाता है।

संत लल्लेश्वरी के दर्शन का सार

| दार्शनिक पहलू | संत लल्लेश्वरी का विचार |

|---|---|

| ईश्वर का स्वरूप | सर्वव्यापी, निराकार और अंतर्यामी शिव |

| मुक्ति का मार्ग | आत्म-साक्षात्कार, अनहद नाद का ध्यान और अहम भाव (अहंकार) का त्याग |

| सामाजिक दृष्टिकोण | हिंदू-मुस्लिम एकता, जातिगत भेदभाव का उन्मूलन और महिलाओं का आध्यात्मिक सशक्तिकरण |

| भाषा माध्यम | जनभाषा (कश्मीरी बोली) में दार्शनिक चिंतन अभिव्यक्ति |

सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक प्रासंगिकता

संत लल्लेश्वरी केवल 14वीं सदी की कवयित्री नहीं थीं, बल्कि वे आज भी कश्मीरी जनमानस की चेतना में जीवित हैं। कश्मीरी भाषा की कहावतों, मुहावरों और लोकगीतों में उनके 'वाख' इस तरह रचे-बसे हैं कि उनके बिना कश्मीरी संस्कृति की कल्पना असंभव है।

उनका जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सच्चा वैराग्य और भक्ति किसी विशेष जाति, लिंग या सामाजिक स्थिति की मोहताज नहीं होती। एक प्रताड़ित गृहणी से लेकर कश्मीर की सर्वोच्च आध्यात्मिक साधिका बनने तक की उनकी यात्रा महिलाओं के सशक्तिकरण का सबसे अनूठा उदाहरण है।

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