सहजोबाई

Shyam Nivas
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 सहजोबाई: जीवन, सहज साधना, अनन्य गुरु-भक्ति और काव्य-चेतना

मध्यकालीन हिंदी साहित्य और भक्ति आंदोलन की पावन परंपरा में स्त्री संत-कवयित्रियों का योगदान अत्यंत विलक्षण और युगांतकारी रहा है। मध्यकाल के अंतिम चरण (अठारहवीं शताब्दी) में उदित हुई संत सहजोबाई का नाम इस श्रृंखला में अत्यंत आदर और गरिमा के साथ लिया जाता है। जहाँ एक ओर भक्तिकाल में मीराबाई की कृष्ण-भक्ति में विरह और सगुण-माधुर्य का अतिरेक दिखता है, वहीं सहजोबाई की वाणी में निर्गुण-सगुण का सहज समन्वय, गुरु-भक्ति की सर्वोपरिता और आत्मानुभूति की अगाध सादगी परिलक्षित होती है।

सहजोबाई संत चरणदास की प्रमुख शिष्या थीं। उनकी वाणी में न तो पांडित्य का आडंबर है और न ही दार्शनिक क्लिष्टता। जिस सहज भाव से उन्होंने ईश्वर, गुरु, नाम-स्मरण और जीवन के यथार्थ को अपनी अनुभूतियों में ढाला, वही उनकी कालजयी काव्य-रचना ‘सहज प्रकाश’ का मूल आधार बना।

1. ऐतिहासिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि

सहजोबाई का आविर्भाव अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध (लगभग 1725 ई.) में हुआ। यह भारतीय इतिहास का वह दौर था जब मुगल साम्राज्य का पतन हो रहा था और राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक विघटन तथा धार्मिक आडंबर चरम पर थे। दिल्ली और मेवात (अलवर) का अंचल इस राजनीतिक उथल-पुथल से सर्वाधिक प्रभावित था।

ऐसे अश्रांत काल में जनता को मानसिक शांति और आध्यात्मिक संबल देने के लिए कई भक्ति-धाराओं और संप्रदायों का विकास हुआ। इनमें चरणदासी संप्रदाय (जिसे 'शुक संप्रदाय' भी कहा जाता है) अत्यंत प्रभावकारी सिद्ध हुआ। संत चरणदास जी ने योग, ज्ञान और भक्ति का एक ऐसा समन्वय प्रस्तुत किया जो आम जनता के लिए सुगम और आचरण योग्य था। इसी संप्रदाय की छत्रछाया में सहजोबाई और उनकी गुरु-बहन दयाबाई ने अपनी भक्ति-साधना को पल्लवित किया।

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                   │ संत चरणदास (शुक संप्रदाय) │

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          सहजोबाई (सहज प्रकाश) दयाबाई (दयाबोध)

  [अनन्य गुरु-भक्ति व सहज योग] [ज्ञान-विराग व नाम-महिमा]


2. जीवन-वृत्त एवं आध्यात्मिक मोड़

सहजोबाई के जन्म और जीवन के संबंध में प्रमाणिक जानकारियाँ मुख्य रूप से उनके ग्रंथ सहज प्रकाश तथा चरणदासी संप्रदाय की आंतरिक साखियों से प्राप्त होती हैं।

जन्म एवं परिवार

सहजोबाई का जन्म 02 अगस्त, 1725 ई. (भाद्रपद कृष्ण पंचमी, संवत् 1782) को माना जाता है। उनका जन्मस्थान दिल्ली का 'परीक्षितपुर' (वर्तमान दिल्ली अंचल) अथवा राजस्थान के अलवर जिले का 'डेहरा' गाँव माना जाता है। विद्वानों का मत है कि उनके पूर्वज अलवर के डेहरा गाँव के निवासी थे, किंतु बाद में उनका परिवार दिल्ली आकर बस गया था।

सहजोबाई वैश्य (धूसर/भार्गव) कुल से संबंध रखती थीं। उनके पिता का नाम हरिप्रसाद तथा माता का नाम अनूपी देवी था। सहजोबाई ने अपनी वाणी में स्वयं अपने पिता का उल्लेख किया है:

> हरि प्रसाद की सुता, नाम है सहजोबाई।

विवाह का अवसर और वैराग्य की घटना

सहजोबाई का बचपन से ही अध्यात्म और प्रभु-नाम में गहरा अनुराग था। तात्कालिक सामाजिक कुरीतियों के अनुसार अल्पआयु (लगभग 11-12 वर्ष) में ही उनके विवाह की तैयारियाँ की जाने लगीं। वधु-वेश में सजी सहजोबाई जब विवाह मंडप में जाने की तैयारी कर रही थीं, तब उनके रिश्ते में मामा के पुत्र और जाने-माने संत चरणदास जी वहाँ पधारे।

चरणदास जी ने सहजोबाई की आध्यात्मिक उच्चता को पहचान लिया और सहज भाव से उनसे कहा:

> "चलना है रहना नहीं, चलना बिस्वा बीस।

> सहजो तनिक सुहाग पर, कहाँ गुथावै शीश॥"

इन वचनों का सहजोबाई के अंतर्मन पर वज्रपात जैसा प्रभाव पड़ा। उसी समय एक आकस्मिक घटना घटी—विवाह हेतु आ रही बारात में आतिशबाजी के कारण दूल्हे का घोड़ा बिदक गया और दूल्हे की असमय मृत्यु हो गई। इस घटना ने सहजोबाई के सांसारिक बंधनों को सदा के लिए काट दिया। उन्होंने समझ लिया कि यह नश्वर जगत् क्षणभंगुर है और सच्चा सुहाग केवल परमात्मा ही है। इसके पश्चात सहजोबाई ने गृहस्थ जीवन का पूर्ण त्याग कर दिया और संत चरणदास जी से दीक्षा लेकर साधना-पथ पर अग्रसर हो गईं।

3. सहजोबाई की अनन्य गुरु-भक्ति

भक्ति आंदोलन के संत-काव्य में गुरु को ईश्वर का मार्गदर्शक माना गया है, परंतु सहजोबाई ने गुरु-भक्ति को जिस पराकाष्ठा पर पहुँचाया, वह संपूर्ण भारतीय साहित्य में अद्वितीय है। उन्होंने गुरु को केवल गोविंद तक पहुँचने का माध्यम नहीं माना, बल्कि ईश्वर से भी ऊँचा और श्रेष्ठ स्थान दिया।

"राम तजूं पर गुरु न बिसारूं"

सहजोबाई का सबसे प्रसिद्ध और क्रांतिकारी पद गुरु-निष्ठा का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है:

> राम तजूं पै गुरु न बिसारूँ।

> हरि को तजूँ गुरु को नहिं त्या गूँ॥

> हरि ने पाँच चोर दिए साथा। गुरु ने छुड़ाय लिया तिन काथा॥

> हरि ने संसार-कूप में डारा। गुरु ने खींचि बाहर करि धारा॥

सहजोबाई का तर्क अत्यंत व्यावहारिक और आध्यात्मिक दृष्टि से गहन है:

 * ईश्वर का विधान बनाम गुरु की कृपा: ईश्वर ने जीव को जन्म देकर इस त्रिगुणात्मक माया और संसार रूपी कुएँ (संसार-कूप) में फेंक दिया, परंतु सद्गुरु ने हाथ पकड़कर बाहर निकाल लिया।

 * विकारों से मुक्ति: ईश्वर ने काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसे पाँच चोर जीव के पीछे लगा दिए, जबकि गुरु ने ज्ञान का दीप जलाकर जीव को इन विकारों से मुक्त कराया।

 * प्रत्यक्ष अनुभव: ईश्वर परोक्ष और अलौकिक हैं, जबकि गुरु प्रत्यक्ष मानव रूप में आकर जीव का उद्धार करते हैं।

इसीलिए सहजोबाई स्पष्ट घोषणा करती हैं कि यदि उन्हें ईश्वर और गुरु में से किसी एक का चयन करना पड़े, तो वे ईश्वर को छोड़ सकती हैं, किंतु गुरु के चरणों का आश्रय कभी नहीं छोड़ेंगी।

गुरु-चरणों की महिमा

सहजोबाई के लिए सद्गुरु ही सर्वतीर्थ हैं। वे लिखती हैं:

> अड़सठ तीरथ गुरु चरण, परवी होत अखंड।

> सहजो ऐसो धामना, सकल अंड ब्रह्मंड॥

अर्थात् तीर्थ यात्राओं का जो फल अड़सठ तीर्थों में भटकने से मिलता है, वह सद्गुरु के चरणों की सेवा में निरंतर और अखंड रूप से प्राप्त हो जाता है। संपूर्ण ब्रह्मांड में गुरु-चरणों से बढ़कर कोई पवित्र स्थान नहीं है।

4. मुख्य कृति: 'सहज प्रकाश' का अनुशीलन

सहजोबाई की प्रामाणिक और एकमात्र उपलब्ध काव्य-कृति ‘सहज प्रकाश’ है। इस ग्रंथ का सम्पादन और संकलन उनके आध्यात्मिक अनुभवों का निचोड़ है। विद्वानों के अनुसार, सहजोबाई ने इस ग्रंथ की रचना मात्र 18 वर्ष की अल्पायु में अपने गुरु के सानिध्य में कर ली थी।

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                          │ सहज प्रकाश │

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    अंग-विभाजन छंद-विधान संगीत/राग

(गुरुदेव को अंग, नाम-सुमिरन, (दोहा, चौपाई, कुंडलिया) (विभिन्न राग-रागिनियाँ)

  माया अंग, साधु अंग आदि)


'सहज प्रकाश' का विषय-विभाजन

सहज प्रकाश में भक्ति और दर्शन के विभिन्न पक्षों को 'अंगों' (अध्यायों) में विभाजित कर प्रस्तुत किया गया है। मुख्य अंग निम्नलिखित हैं:

| अंग / अध्याय | विषय-वस्तु और आध्यात्मिक संदेश |

|---|---|

| गुरुदेव का अंग | सद्गुरु की महिमा, गुरु-दीक्षा का महत्व और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा। |

| नाम-सुमिरन का अंग | भगवन्नाम के निरंतर स्मरण की महिमा और अजपा-जाप का रहस्य। |

| माया का अंग | संसार की नश्वरता, माया का छलावा और सांसारिक विषयों से चेतावनी। |

| साधु/संत का अंग | सच्चे साधु के लक्षण, सत्संगति का प्रभाव और पाखंड का खंडन। |

| पतिव्रता का अंग | भक्त की भगवान या गुरु के प्रति एकनिष्ठता और अनन्य प्रेम का निरूपण। |

| सोलह तिथि एवं सात वार निर्णय | कालचक्र, 84 लाख योनि के दुख और जीव जागृति के उपदेश। |

5. दार्शनिक चेतना और साधना-मार्ग

सहजोबाई की दार्शनिक दृष्टि संकीर्णता से परे है। उन्होंने सगुण और निर्गुण के पारंपरिक विवाद को पूरी तरह से निरस्त कर दिया। उनके लिए जो निर्गुण ब्रह्म वेदों में 'नेति-नेति' कहकर वर्णित किया गया है, वही सगुण रूप में भक्त के हृदय में और होंठों पर मुरली धारण कर प्रकट होता है।

1. सहज योग और आत्मानुभूति

सहजोबाई की साधना का मूल 'सहज साधना' है। सहज का अर्थ है—हठयोग के कठोर क्लेशों से मुक्त, स्वभाविक और सरल ईश्वर-प्रेम।

> प्रेम लटक दुर्लभ महा, पावै गुरु के ध्यान।

> अजपा सुमिरण कहत हूं, उपजै केवल ज्ञान॥

वे बाह्य आडंबरों, जप-तप के कठिन कठोर नियमों और देह-दमन की विरोधी थीं। मन को गुरु के ध्यान में लीन करना और श्वास-प्रश्वास के साथ 'अजपा जाप' करना ही उनका सहज मार्ग था।

2. जगत् की असारता और संसार-बोध

सहजोबाई ने इस संसार को स्वप्न-वत् और इंद्रजाल माना है। वे चेतावनी देती हैं कि जिस संसार में जीव अपने संबंध बनाता है, वह क्षणिक और नश्वर है:

> ऐसे ही सब स्वप्न हैं, स्वर्ग, मिर्तु पाताल।

> तीन लोक छल रूप हैं, सहजो इन्दरजाल॥

संसार के दुखों और सुखों पर वे ज्ञानी की भाँति तटस्थ रहने का उपदेश देती हैं। ज्ञानी केवल द्रष्टा भाव में रहता है, जबकि अज्ञानी उसमें लिप्त होकर कष्ट भोगता है।

3. राम-नाम की महिमा

नाम-स्मरण को सहजोबाई भवसागर से तरने की एकमात्र नौका मानती हैं:

> सहजो नौका नाम है, चढ़ि के उतरौ पार।

> राम सुमिरि जान्यो नहीं, ते डूबे मझधार॥

6. स्त्री-विमर्श और सहजोबाई

मध्यकालीन भारत में महिलाओं की सामाजिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी। पर्दा प्रथा, बाल विवाह, सती प्रथा और शिक्षा का अभाव आम बात थी। ऐसे समय में सहजोबाई का एक संत और कवयित्री के रूप में उभरना सामाजिक क्रांति से कम नहीं था।

दैन्यहीनता और आत्म-गौरव

हिंदी की अधिकतर मध्यकालीन स्त्री-कवयित्रियों की रचनाओं में कहीं न कहीं सामाजिक उत्पीड़न, परिवार का विरोध या स्त्री होने की पीड़ा झलकती है, परंतु सहजोबाई की वाणी में स्त्री होने की कोई शिकायत या दीनता (दैन्य) नहीं है।

वे स्वयं को किसी असहाय स्त्री के रूप में न देखकर एक 'जाग्रत आत्मा' के रूप में देखती हैं। उनका आत्मविश्वास इतना सुदृढ़ था कि वे गृहस्थ के झूठे सुहाग को ठुकरा कर प्रभु के 'अटल सुहाग' को स्वीकार करती हैं।

  मीराबाई सहजोबाई दयाबाई

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• सगुण-माधुर्य भाव • निर्गुण-सगुण समन्वय • भक्ति व विरति का संदेश

• विरह और राजसी संघर्ष • गुरु-भक्ति व सादगी • ज्ञान-विवेक पर बल

• लोक-लाज का त्याग • पूर्ण आत्म-संतोष व आनंद • सरल वाणी


7. काव्य-सौंदर्य एवं भाषा-शिल्प

सहजोबाई का काव्य कला-प्रदर्शन के लिए नहीं लिखा गया, बल्कि वह उनके अंतःकरण के स्वतःस्फूर्त उद्गार का परिणाम है। इसी कारण विद्वानों ने सहजोबाई की शैली को "सादगी का सार" कहा है।

भाषा का स्वरूप

सहजोबाई की भाषा मुख्य रूप से तत्कालीन दिल्ली अंचल की खड़ी बोली है, जिस पर ब्रजभाषा, राजस्थानी, पंजाबी और फ़ारसी का सुंदर प्रभाव दिखाई देता है। उनकी भाषा में क्लिष्ट संस्कृत शब्दावली के स्थान पर व्यावहारिक तद्भव और लोक-प्रचलित शब्द हैं।

छंद और राग-विधान

सहजोबाई ने मुख्य रूप से दोहा, चौपाई, पद और कुंडलियाँ छंदों का प्रयोग किया है। उनके अधिकांश पद भारतीय शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों (जैसे राग सोरठ, राग बिलावल, राग काफ़ी, राग भैरवी आदि) में गाए जा सकने वाले गेय पद हैं।

बिंब और अलंकार विधान

सहजोबाई के काव्य में अलंकरण अनायास ही आया है। रूपक, दृष्टांत, अनुप्रास और उपमा अलंकारों का प्रयोग अत्यंत स्वाभाविक है।

 * कृपण का उदाहरण (दृष्टांत):

   > गुरुवचन हिय ले धरो, ज्यों कृपणन के दाम।

   > भूमिगढ़े माथे दिये, सहजो लहै न राम॥

   > (अर्थात् जिस प्रकार कंजूस व्यक्ति अपने धन को छिपाकर और सहेजकर रखता है, उसी प्रकार शिष्य को गुरु के वचनों को अपने हृदय में सुरक्षित रखना चाहिए।)

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8. दयाबाई और सहजोबाई का तुलनात्मक अध्ययन

संत चरणदास जी की दो प्रमुख शिष्याएँ थीं—सहजोबाई और दयाबाई। ये दोनों न केवल गुरु-बहनें थीं, बल्कि एक ही युग और अंचल की महान संत कवयित्रियाँ थीं।

 * काव्य-ग्रंथ: सहजोबाई की रचना 'सहज प्रकाश' है, जबकि दयाबाई की प्रमुख रचनाएँ 'दयाबोध' और 'विनय मालिका' हैं।

 * भक्ति का केंद्र: सहजोबाई की भक्ति में गुरु-माहात्म्य और अजपा-जाप की प्रधानता है, जबकि दयाबाई की रचनाओं में विनय, दैन्य-भाव और प्रभु से प्रार्थना का बाहुल्य है।

 * अभिव्यक्ति शैली: सहजोबाई की वाणी अधिक निर्भीक, स्पष्ट और संशयरहित है, वहीं दयाबाई का स्वर अधिक कोमल और विनीत है।

9. निष्कर्ष एवं आधुनिक प्रासंगिकता

संत सहजोबाई अठारहवीं शताब्दी के हिंदी साहित्य की वह अमूल्य मणिका हैं, जिनकी चमक समय के साथ और अधिक निखरती गई है। आधुनिक युग में जहाँ मनुष्य मानसिक तनाव, बाह्य आडंबर, वैचारिक द्वंद्व और भौतिकतावादी अंधी दौड़ में फँसा हुआ है, वहाँ सहजोबाई का 'सहज योग' और 'सादगी का मार्ग' शांति और संतुलन प्रदान करता है।


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