श्री सत्यनारायण व्रत कथा: महिमा, पूजन विधि एवं पाँचों अध्याय
सनातन धर्म में श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा और कथा का विशेष स्थान है। स्कंद पुराण के रेवा खंड में वर्णित यह कथा भगवान विष्णु के 'सत्य' स्वरूप की उपासना का प्रतीक है। सत्यनारायण शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—'सत्य' अर्थात परम चेतना व शाश्वत नियम, और 'नारायण' अर्थात समस्त जीवों के निवास स्थान भगवान विष्णु।
श्री सत्यनारायण व्रत का महत्व और मूल सिद्धांत
सत्यनारायण व्रत का मुख्य संदेश जीवन में सत्य के आचरण, संकल्प के पालन और अहंकार-रहित निष्ठा की प्रतिष्ठा करना है।
श्री सत्यनारायण व्रत कथा (पाँच अध्याय)
प्रथम अध्याय: कथा का उद्गम और नारद-विष्णु संवाद
नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि अस्सी हजार ऋषियों ने महर्षि सूत जी से प्रश्न किया—"हे मुनिवर! इस कलयुग में कौन सा ऐसा सुलभ और फलदायी व्रत या तप है, जिससे मनुष्य के समस्त दुख दूर हों और उसे धन-धान्य तथा मोक्ष की प्राप्ति हो?"
महर्षि सूत जी ने उत्तर दिया कि यही प्रश्न एक बार देवर्षि नारद ने भगवान नारायण से पूछा था।
एक समय देवर्षि नारद लोक-कल्याण की इच्छा से विभिन्न लोकों में भ्रमण करते हुए मृत्युलोक पहुंचे। वहां उन्होंने मनुष्यों को अपने-अपने कर्मों के कारण अनेकविध दुखों से पीड़ित पाया। अत्यंत दयालु नारद जी तुरंत बैकुंठ लोक पहुंचे और श्रीहरि विष्णु की स्तुति करते हुए बोले:
> "हे सर्वव्यापी प्रभु! आप मन और वाणी से परे हैं। मृत्युलोक में मनुष्य अपने कर्मों के कारण अत्यंत दुखी हो रहे हैं। यदि मुझ पर आपकी कृपा है, तो कोई ऐसा सरल उपाय बताइए जिससे उनके दुखों का निवारण हो सके।"
>
भगवान विष्णु ने मुस्कुराकर कहा—"हे नारद! तुमने संसार के कल्याण के लिए अत्यंत उत्तम प्रश्न किया है। स्वर्ग और मृत्युलोक में एक ऐसा दुर्लभ व्रत है जो तुरंत फल प्रदान करता है। वह है श्री सत्यनारायण का व्रत। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक किसी भी दिन या पूर्णिमा, संक्रांति के अवसर पर सत्यनारायण का पूजन करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है।"
द्वितीय अध्याय: निर्धन ब्राह्मण और लकड़हारे की कथा
सूत जी बोले—हे ऋषियों! अब इस व्रत को सर्वप्रथम करने वालों की कथा सुनो।
काशी नगरी में एक अत्यंत निर्धन और भिक्षाटन करने वाला वृद्ध ब्राह्मण रहता था। वह भोजन के लिए दर-दर भटकता था। उसकी गरीबी देखकर भगवान विष्णु ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और उसके पास जाकर पूछा—"हे भूसुर! तुम इतने दुखी और व्याकुल होकर क्यों घूमते हो?"
ब्राह्मण ने अपनी दरिद्रता की कथा सुनाई। तब छद्मवेशी भगवान ने कहा—"श्री सत्यनारायण भगवान सर्वमनोरथ पूर्ण करने वाले हैं। तुम उनका पूजन करो।" भगवान ने ब्राह्मण को पूजन की सरल विधि बताई और अंतर्ध्यान हो गए।
ब्राह्मण ने मन ही मन संकल्प लिया कि वह कल अवश्य यह व्रत करेगा। उस रात उसे नींद नहीं आई। अगले दिन भिक्षा में उसे सामान्य से अधिक धन मिला। उसने उसी धन से पूजन सामग्री खरीदी और परिवार व पड़ोसियों के साथ भगवान सत्यनारायण की कथा की। व्रत के प्रभाव से वह शीघ्र ही धन-धान्य से संपन्न हो गया और निष्पाप होकर अंत में वैकुंठ गया।
लकड़हारे का आख्यान:
एक दिन वही ब्राह्मण पूजन कर रहा था, तभी एक बूढ़ा लकड़हारा लकड़ी का गट्ठर बेचने वहां से गुजरा। वह प्यास के कारण ब्राह्मण के घर में पानी पीने आया। उसने भक्तिपूर्वक हो रहे पूजन को देखा और ब्राह्मण से पूछा—"आप यह किसका पूजन कर रहे हैं और इससे क्या फल मिलता है?"
ब्राह्मण ने उत्तर दिया—"यह सर्वकामप्रद सत्यनारायण भगवान की पूजा है। इनकी कृपा से धन, पुत्र और सुख की प्राप्ति होती है।" लकड़हारे ने मन ही मन संकल्प किया—"आज लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा, उसी से मैं भी सत्यनारायण भगवान की पूजा करूंगा।"
वह शहर गया और उस दिन उसे लकड़ियों के दो गुने दाम मिले। अत्यंत प्रसन्न होकर उसने केला, आटा, शक्कर, घी और दूध खरीदकर अपने बंधु-बांधवों के साथ सत्यनारायण जी का व्रत एवं पूजन किया। इस व्रत के प्रभाव से उसे धन-पुत्र का सुख मिला और जीवन के अंत में मोक्ष प्राप्त हुआ।
तृतीय अध्याय: साधु वैश्य और लीलावती-कलावती की कथा
सूत जी बोले—आगे की कथा सुनो। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम के एक जितेन्द्रिय और सत्यवादी राजा राज्य करते थे। उनकी पत्नी का नाम भद्रशीला था।
एक दिन राजा-रानी भद्रशीला नदी के तट पर सत्यनारायण भगवान का पूजन कर रहे थे। उसी समय 'साधु' नाम का एक धनी व्यापारी (वैश्य) व्यापार के लिए अपनी नौका लेकर वहां पहुंचा। उसने राजा को पूजन करते देख नम्रतापूर्वक पूछा—"हे राजन! आप किस देवता का पूजन कर रहे हैं?"
राजा ने कहा—"हम सर्वशक्तिमान श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन कर रहे हैं जिससे संतान और समृद्धि प्राप्त होती है।" यह सुनकर साधु वैश्य ने कहा—"महाराज, मेरी भी कोई संतान नहीं है। मैं भी संतान प्राप्ति के लिए यह व्रत करूंगा।"
घर लौटकर उसने अपनी पत्नी लीलावती को व्रत का संकल्प सुनाया। समय आने पर लीलावती ने एक अत्यंत सुंदर कन्या को जन्म दिया, जिसका नाम कलावती रखा गया। परंतु साधु वैश्य ने अपना संकल्प टाल दिया और कहा कि कन्या के विवाह के समय पूजन करेगा।
जब कलावती विवाह योग्य हुई, तो उसका विवाह कांचन नगर के एक सुयोग्य वणिक-पुत्र (जमाई) से कर दिया गया। किंतु वैश्य धन के लोभ में भगवान सत्यनारायण का पूजन करना भूल गया।
भगवान का कोप और संकट:
संकल्प भूलने के कारण भगवान सत्यनारायण अप्रसन्न हो गए। साधु वैश्य अपने दामाद के साथ रत्नासारपुर नामक नगर में व्यापार करने गया। वहां राजा चंद्रकेतु का राज्य था।
एक रात राजा के महल से चोर रत्न चुराकर भागे। राजा के सैनिक पीछा कर रहे थे। चोरों ने पकड़े जाने के भय से चुराया हुआ धन साधु वैश्य और उसके दामाद की नौका में छिपा दिया और भाग गए। सैनिकों ने वहां पहुंचकर साधु वैश्य और उसके दामाद को चोर समझकर बंदी बना लिया और राजा के समक्ष प्रस्तुत किया। राजा चंद्रकेतु ने बिना सोचे-समझे दोनों को कारागार में डाल दिया और उनका सारा धन-माल जब्त कर लिया।
उधर साधु वैश्य के घर में भी चोरी हो गई। उसकी पत्नी लीलावती और पुत्री कलावती भिक्षा मांगने पर विवश हो गईं।
चतुर्थ अध्याय: संकट निवारण, संकल्प पूर्ति और प्रसाद का महत्व
एक दिन कलावती भोजन की तलाश में भटकते हुए एक ब्राह्मण के घर पहुंची, जहां श्री सत्यनारायण भगवान की कथा हो रही थी। उसने ध्यानपूर्वक कथा सुनी, प्रसाद ग्रहण किया और रात को घर लौटी।
मां लीलावती ने विलंब का कारण पूछा, तो कलावती ने कहा—"मां, मैंने एक घर में सत्यनारायण भगवान का पूजन देखा है जो सभी दुखों को दूर करता है।" लीलावती को तुरंत पति का भूला हुआ संकल्प याद आ गया। उसने अगले ही दिन भक्तिपूर्वक सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और क्षमा याचना की।
भगवान प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा—"हे राजन! जिन दो वैश्यों को तुमने बंदी बनाया है, वे निर्दोष हैं। उन्हें तुरंत मुक्त करो और उनका धन लौटा दो, अन्यथा तुम्हारा राज्य नष्ट हो जाएगा।"
अगले दिन राजा ने दोनों को मुक्त किया, उनका दोगुना धन लौटाया और आदर-सत्कार करके विदा किया।
समुद्र में दंडी स्वामी का चमत्कार:
नाव में लौटते समय भगवान सत्यनारायण ने एक संन्यासी (दंडी स्वामी) का रूप धारण कर साधु वैश्य से पूछा—"हे वैश्य! तुम्हारी नौका में क्या भरा है?"
अहंकार में आकर साधु ने झूठ कहा—"हे स्वामी! हमारी नौका में तो केवल लता-पत्ते और झाड़ियां भरी हैं।"
दंडी स्वामी ने कहा—"एवमस्तु" (ऐसा ही हो) और वहां से चले गए।
जब साधु ने देखा तो नौका में वास्तव में केवल पत्ते और झाड़ियां थीं। वह मूर्छित हो गया। उसके दामाद ने कहा—"यह उन संन्यासी महाराज का ही चमत्कार है, हमें उनसे क्षमा मांगनी चाहिए।"
साधु वैश्य ने संन्यासी के चरणों में गिरकर रोते हुए अपनी भूल स्वीकार की। भगवान ने अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होकर उसे चेताया कि उसने बार-बार संकल्प तोड़ा था। साधु द्वारा सच्चे मन से क्षमा मांगने पर नाव पुनः धन-धान्य से भर गई।
प्रसाद का अनादर:
नगर के निकट पहुंचकर साधु ने अपने आगमन का संदेश घर भेजा। लीलावती और कलावती उस समय सत्यनारायण की कथा सुन रही थीं। कलावती पति के आने का समाचार सुनकर अत्यंत उतावली हो गई और पूजा समाप्त होते ही बिना प्रसाद लिए नदी तट की ओर दौड़ पड़ी।
प्रसाद का अनादर करने के कारण भगवान रुष्ट हो गए और उन्होंने उसके पति तथा नाव को जल में डुबो दिया। कलावती रोने लगी और पति के न मिलने पर प्राण त्यागने को तैयार हो गई।
आकाशवाणी हुई—"हे कलावती! तुमने मेरे प्रसाद का अनादर किया है। यदि तुम घर जाकर श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण कर वापस आओगी, तो तुम्हारा पति तुम्हें सुरक्षित मिलेगा।" कलावती ने तुरंत लौटकर प्रसाद ग्रहण किया। तट पर पहुंचते ही उसने देखा कि उसका पति और नौका पुनः प्रकट हो गए थे। इसके बाद साधु वैश्य ने जीवनभर नियमपूर्वक सत्यनारायण पूजन किया।
पंचम अध्याय: राजा तुंगध्वज और ग्वालों का आख्यान
महर्षि सूत जी बोले—हे मुनियों! अब एक और कथा सुनो जो प्रसाद के महत्व को रेखांकित करती है।
प्राचीन काल में तुंगध्वज नाम के एक राजा थे। वे अत्यंत प्रजापालक थे किंतु अपने अहंकार में डूबे रहते थे। एक बार वे वन में शिकार खेलने गए। एक वटवृक्ष के नीचे उन्होंने देखा कि गांव के ग्वाले (चरवाहे) मिलकर भक्तिभाव से श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन कर रहे थे।
राजा ने अहंकारवश न तो भगवान को प्रणाम किया और न ही ग्वालों के पास गए। जब पूजन समाप्त हुआ, तो ग्वालों ने राजा के पास आकर आदरपूर्वक भगवान का प्रसाद रखा। राजा ने उस प्रसाद को वहीं छोड़ दिया और अपने नगर लौट गए।
राजमहल पहुंचते ही राजा ने देखा कि उनके सौ पुत्र मृत पड़े हैं, उनका सारा राजकोष नष्ट हो गया है और राज्य पर शत्रुओं का अधिकार हो गया है।
राजा को तुरंत अपनी भूल का अहसास हुआ कि यह सब सत्यनारायण भगवान के प्रसाद के अनादर और अहंकार का फल है। वे तुरंत उसी वटवृक्ष के पास पहुंचे। उन्होंने ग्वालों को बुलाया और उनके साथ मिलकर अत्यंत नम्रता एवं भक्तिभाव से सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और प्रसाद ग्रहण किया।
भगवान की कृपा से उनके सौ पुत्र जीवित हो गए, राजकोष पुनः भर गया और राज्य वापस मिल गया। अंत समय में राजा बैकुंठ लोक को गए।
सत्यनारायण कथा के मुख्य संदेश
* सत्य ही ईश्वर है: कथा का मूल संदेश है कि किसी भी परिस्थिति में अपने वचन और सत्य का त्याग न करें।
* अहंकार का विनाश: राजा तुंगध्वज और साधु वैश्य के आख्यान से स्पष्ट है कि धन या सत्ता का अहंकार पतन का कारण बनता है।
* समभाव और भक्ति: भगवान के दरबार में निर्धन ब्राह्मण, गरीब लकड़हारा, वैश्य और ग्वाले सभी समान हैं।
* प्रसाद का सम्मान: ईश्वर का प्रसाद विनम्रता और श्रद्धा का प्रतीक है; इसका अनादर नहीं करना चाहिए।
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