श्रीमद्भागवत कथा

Shyam Nivas
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 श्रीमद्भागवत कथा: दिव्य रस, भक्ति सिद्धांत एवं द्वादश स्कंधों का अनुशीलन

सनातनीय वांग्मय में श्रीमद्भागवत महापुराण को समस्त वेदों और उपनिषदों का पक्व मधुर फल माना गया है। यह केवल एक पौराणिक ग्रंथ नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष भगवान श्री हरि का वाङ्मय स्वरूप है। जहाँ भगवद्गीता स्वयं भगवान के श्रीमुख की वाणी (उपदेश) है, वहीं भागवत महापुराण भगवान का समग्र दिव्य चरित्र, उनका विग्रह और भक्त-भगवान के अद्वैत सम्बंध की जीवंत अभिव्यक्ति है।

1. श्रीमद्भागवत महापुराण: तात्विक स्वरूप एवं प्राकट्य

श्रीमद्भागवत का शाब्दिक अर्थ है—“जो भागवत (भगवान से सम्बंधित) हो अथवा जो भगवद्भक्तों के चरित्र से परिपूर्ण हो।” इस महापुराण की रचना महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी ने की थी।

वेदव्यास जी की असंतोष-मुक्ति और नारद-संवाद

चारों वेदों का विभाजन करने, अठारह पुराणों की रचना करने तथा महाभारत जैसे विशाल इतिहास ग्रंथ का प्रणयन करने के पश्चात भी महर्षि वेदव्यास जी का चित्त शांत नहीं था। उनके हृदय में एक अपूर्णता और अशान्ति बनी हुई थी।

तभी उनके आश्रम (शम्याप्रास) में देवर्षि नारद जी का आगमन हुआ। व्यास जी ने अपनी आत्मग्लानि का कारण पूछा, तो नारद जी ने कहा:

> "हे महर्षि! आपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सिद्धांतों का विस्तार से निरूपण तो किया, किंतु भगवान श्रीहरि के निर्मल, निष्काम यश और उनकी रसमयी लीलाओं का निरूपण उस तन्मयता से नहीं किया। जिस वाणी में जगतपति श्रीकृष्ण की महिमा का गान नहीं होता, वह वाणी कौवों के आनंद स्थान के समान है, जहाँ हंस कभी रमण नहीं करते।"

नारद जी के उपदेश से प्रेरित होकर वेदव्यास जी ने समाधि भाषा में भगवान के पूर्ण रूप का दर्शन किया और भक्ति-रस-बोधिनी श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की।

निगमकल्पतरोर्गलितं फलम् (वेद रूपी कल्पवृक्ष का पका फल)

भागवत के प्रथम अध्याय में ही कहा गया है:

अर्थात, वेद रूपी कल्पवृक्ष का यह सर्वथा पका हुआ अमृतरस से परिपूर्ण फल है। शुकदेव जी रूपी तोते के मुख का स्पर्श होने से इसमें अमृत का माधुर्य और अधिक बढ़ गया है। यह जब तक मोक्ष प्राप्त न हो जाए (या मोक्ष के पश्चात भी), निरंतर पीने योग्य रस है।

2. भागवत महात्म्य एवं कथा-श्रवण विधान

पद्म पुराण में श्रीमद्भागवत के महात्म्य का विस्तृत वर्णन आता है, जो इसके श्रवण के अधिकार, फल और विधि को स्पष्ट करता है।

भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का पुनरुज्जीवन

एक बार देवर्षि नारद जी ने देखा कि भक्ति देवी एक तरुणी के रूप में वृन्दावन में विराजमान हैं, किंतु उनके दो पुत्र—ज्ञान और वैराग्य—वृद्ध, अचेतन और मुमूर्षु अवस्था में पड़े हैं। भक्ति देवी ने नारद जी से अपने पुत्रों के कष्ट निवारण की प्रार्थना की।

नारद जी ने वेदों के मन्त्रों और उपनिषदों के पाठ से उन्हें जगाने का प्रयास किया, किंतु वे नहीं जागे। अंत में सनकादि ऋषियों (सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार) ने नारद जी को परामर्श दिया कि ज्ञान और वैराग्य को केवल श्रीमद्भागवत की सप्ताहमयी कथा से ही नवजीवन प्राप्त हो सकता है।

आनंदतीर्थ (हरिद्वार) में गंगा तट पर सनकादि ऋषियों ने व्यासपीठ ग्रहण किया और नारद जी मुख्य श्रोता बने। कथा के श्रवण मात्र से ज्ञान और वैराग्य का वृद्धत्व समाप्त हो गया और वे पुनः नवयुवक होकर नृत्य करने लगे।

धुंधुकारी और गोकर्ण की कथा

भागवत महात्म्य में आत्मदेव नामक ब्राह्मण के दो पुत्रों—गोकर्ण (परम ज्ञानी) और धुंधुकारी (अत्यंत पापी व कुकर्मी)—की कथा आती है।

 * अपने कुकर्मों के कारण धुंधुकारी अकाल मृत्यु को प्राप्त होकर महाप्रेत बना।

 * गोकर्ण जी ने अपने भाई की मुक्ति के लिए गया में पिंड दान आदि अनेक उपाय किए, किंतु प्रेतयोनि से मुक्ति न मिली।

 * अंततः सूर्यदेव के निर्देश पर गोकर्ण जी ने श्रीमद्भागवत सप्ताह यज्ञ का आयोजन किया।

 * धुंधुकारी प्रेत रूप में सात गांठ वाले बाँस में बैठकर प्रतिदिन एक-एक गांठ को भेदते हुए सात दिनों तक निष्ठापूर्वक कथा सुनता रहा।

 * सातवें दिन कथा की समाप्ति पर बाँस फटा और धुंधुकारी दिव्य रूप धारण कर वैकुंठ धाम को गमन कर गया। यह कथा सिद्ध करती है कि भागवत कथा महान पतित से पतित जीव का भी उद्धार कर सकती है।

सप्ताह पारायण एवं श्रोता-वक्ता के लक्षण

| विषय | वक्ता (कथावाचक) के लक्षण | श्रोता (सुनने वाले) के लक्षण |

|---|---|---|

| योग्यता | वेद-वेदांग का ज्ञाता, विरक्त, भगवद्भक्त, निर्लोभी, शांत चित्त | श्रद्धावान, संयमी, निष्काम भावना वाला, अनन्य एकाग्रता |

| आचरण | ब्रह्मचर्य, अल्पाहार, सत्यवक्ता, लोभ-रहित | कथाकाल में मौन, सात्विक भोजन, ईर्ष्या व आलस्य से मुक्त |

| लक्ष्य | केवल भगवद्यश का गान एवं श्रोताओं का कल्याण | भगवच्चरणों में अनन्य प्रीति और आत्म-विशुद्धि |

3. श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कंध: तात्विक एवं कथात्मक अनुशीलन

श्रीमद्भागवत में 12 स्कंध (अध्याय समूह), 335 अध्याय और 18,000 श्लोक हैं। ये बारह स्कंध भगवान श्रीकृष्ण के बारह श्रीअंग (शरीर के अंगों) के समान माने गए हैं।

प्रथम व द्वितीय स्कंध -> भगवान के श्रीचरण कमल

तृतीय व चतुर्थ स्कंध -> भगवान की दोनों जंघाएँ

पंचम स्कंध -> भगवान की नाभि

षष्ठ स्कंध -> भगवान का वक्षःस्थल (छाती)

सप्तम व अष्टम स्कंध -> भगवान की दोनों भुजाएँ

नवम स्कंध -> भगवान का कण्ठ

दशम स्कंध -> भगवान का मन्दहासित मुखारविन्द

एकादश स्कंध -> भगवान का ललाट (मस्तक)

द्वादश स्कंध -> भगवान का मुकुट/शिरोमणि


प्रथम स्कंध: अधिकार लीला (सम्बंध ज्ञान)

प्रथम स्कंध भागवत कथा का प्रवेश द्वार है। इसमें कुल 19 अध्याय हैं।

 * नैमिषारण्य में ऋषियों के प्रश्न: शौनकादि अस्सी हजार ऋषियों ने सूत जी से मानव कल्याण हेतु 6 प्रश्न पूछे—समस्त शास्त्रों का सार क्या है? कलयुग के जीवों का कल्याण कैसे हो? भगवान के अवतारों का प्रयोजन क्या है?

 * सूत जी द्वारा भागवत महिमा: सूत जी ने स्पष्ट किया कि सर्वोत्कृष्ट धर्म वही है जिससे भगवान अधोक्षज (श्रीकृष्ण) में निष्काम और अहैतुकी भक्ति उत्पन्न हो।

 * सूत-शुकदेव-परीक्षित सम्पाद: पांडवों के स्वर्गारोहण के पश्चात राजा परीक्षित का चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित हुआ।

 * परीक्षित को शृंगी ऋषि का शाप: राजा परीक्षित ने वन में भूख-प्यास से व्याकुल होकर ध्यानमग्न शमीक ऋषि के गले में मृत सर्प डाल दिया। ऋषि के पुत्र शृंगी ने रुष्ट होकर शाप दिया कि आज से सातवें दिन 'तक्षक' सर्प के काटने से परीक्षित की मृत्यु होगी।

 * गंगा तट पर अनशन व शुकदेव जी का आगमन: राजा परीक्षित ने शाप को भगवान का अनुग्रह माना और राज्य त्यागकर गंगा तट (शुकताल) पर अनशन व्रत धारण किया। वहाँ महर्षि शुकदेव जी का आगमन हुआ, जिन्होंने मुमुक्षु जीव के कर्तव्य पर उपदेश प्रारंभ किया।

द्वितीय स्कंध: साधन लीला (पुरुष रूप व चतुःश्लोकी)

द्वितीय स्कंध में 10 अध्याय हैं, जो योग, ध्यान और भक्ति के व्यावहारिक साधनों पर प्रकाश डालते हैं।

 * विराट पुरुष का ध्यान: शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को बताया कि मृत्यु के समय मनुष्य को अभय होकर समस्त आसक्तियों का त्याग करना चाहिए और भगवान के स्थूल (विराट) रूप का ध्यान करना चाहिए।

 * सृष्टि प्रक्रिया: भगवान के संकल्प मात्र से प्रकृति, महत्तत्व, अहंकार, पंचतत्व और दसों इंद्रियों का प्राकट्य कैसे हुआ, इसका विस्तृत विवरण।

 * चतुःश्लोकी भागवत: इस स्कंध का सबसे महत्वपूर्ण अंश 'चतुःश्लोकी भागवत' (अध्याय 9) है, जो स्वयं नारायण ने ब्रह्मा जी को उनके सृष्टि-रचना काल में सुनाया था:

> सार: सृष्टि से पूर्व केवल मैं ही था, सृष्टि के रहने पर भी मैं ही हूँ, और प्रलय के बाद जो शेष रहता है, वह भी मैं ही हूँ। जो आत्मा से भिन्न प्रतीत होता है, वह माया है।

तृतीय स्कंध: सर्ग लीला (विदुर-मैत्रेय संवाद व कपिलावतार)

तृतीय स्कंध में 33 अध्याय हैं। यह भौतिक सृष्टि के प्राकट्य और सांख्य शास्त्र का प्रतिपादन करता है।

 * विदुर-उद्धव व विदुर-मैत्रेय संवाद: कौरवों की कुनीति से व्यथित होकर विदुर जी तीर्थयात्रा पर निकल गए। यमुना तट पर उद्धव जी से उनकी भेंट हुई जहाँ उन्हें श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन का समाचार मिला। तत्पश्चात वे हरिद्वार में महर्षि मैत्रेय के पास पहुँचे।

 * वराह अवतार व हिरण्याक्ष वध: जब दैत्य हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को ले जाकर रसातल में छिपा दिया, तब ब्रह्मा जी की नासिका से भगवान वराह रूप में प्रकट हुए। भगवान वराह ने रसातल से पृथ्वी का उद्धार किया और हिरण्याक्ष का वध किया।

 * कर्दम-देवहूति विवाह एवं कपिल भगवान का प्राकट्य: प्रजापति कर्दम और देवहूति का विवाह हुआ। उनके यहाँ भगवान विष्णु 'कपिल' के रूप में अवतरित हुए।

 * कपिल देव का सांख्य दर्शन एवं भक्ति उपदेश: भगवान कपिल ने अपनी माता देवहूति को भक्ति-मिश्रित सांख्य योग का उपदेश दिया। उन्होंने भक्ति के नवधा रूपों, काल के स्वरूप और देहाध्यास से मुक्ति का मार्ग विस्तार से समझाया।

चतुर्थ स्कंध: विसर्ग लीला (ध्रुव, पृथु एवं पुरंजन उपाख्यान)

चतुर्थ स्कंध में 31 अध्याय हैं, जो कर्म-बंधन, तपस्या और अवतारों के कर्म-विधान को दर्शाते हैं।

प्रमुख कथाएँ एवं उनके आध्यात्मिक संदेश

| कथा / चरित्र | मुख्य विवरण | आध्यात्मिक शिक्षा |

|---|---|---|

| सती देहत्याग व दक्ष यज्ञ विध्वंस | राजा दक्ष द्वारा शिव जी का अनादर; सती द्वारा योगाग्नि में देह त्याग; वीरभद्र द्वारा दक्ष का मस्तक छेदन। | महादेव (ईश्वर) के अनादर से समस्त धार्मिक अनुष्ठान निष्फल और विनाशकारी हो जाते हैं। |

| ध्रुव चरित्र | बालक ध्रुव को सौतेली माँ सुरुचि का तिरस्कार; नारद जी के उपदेश से मधुवन में कठोर तप; 6 माह में विष्णु दर्शन। | दृढ संकल्प, भक्ति और गुरु-कृपा से असम्भव भी सम्भव हो जाता है। ध्रुव पद अचल भक्ति का प्रतीक है। |

| राजा पृथु चरित्र | दुष्ट राजा वेन के शरीर से पृथु का प्राकट्य; पृथ्वी को दोहन कर समस्त औषधियों व अन्नों की पुनः प्राप्ति। | राजा को प्रजापालक और प्रकृति का संवर्धक होना चाहिए; पर्यावरण संतुलन का सनातन सूत्र। |

| पुरंजन उपाख्यान | पुरंजन (जीव) और उसके अज्ञात मित्र (ईश्वर) की रूपकात्मक (Allegorical) कथा। | शरीर एक 9 द्वारों का नगर है; जीव विषयों में फँसकर अपने परम मित्र (परमात्मा) को भूल जाता है। |

पंचम स्कंध: स्थान लीला (ऋषभदेव, जड़भरत एवं ब्रह्मांड वर्णन)

पंचम स्कंध में 26 अध्याय हैं, जिसमें परमहंस धर्म, वैराग्य और वैदिक भूगोल-खगोल का निरूपण है।

 * भगवान ऋषभदेव का चरित्र: राजा नाभि के पुत्र ऋषभदेव (भगवान का अवतार) ने अपने १०० पुत्रों को परमहंस धर्म की दीक्षा दी और वैराग्य स्वीकार कर अवधूत वृत्ति धारण की। उन्होंने कहा कि यह मानव शरीर केवल तुच्छ विषय-भोगों के लिए नहीं, बल्कि भक्ति और तपस्या द्वारा अनंत सुख (मोक्ष) प्राप्त करने के लिए है।

 * राजा भरत (जड़भरत) का आख्यान:

   * राजा भरत ने राजपाठ त्यागकर पुलहाश्रम में तपस्या शुरू की।

   * एक हिरण के बच्चे में आसक्ति के कारण उनका अगला जन्म हिरण के रूप में हुआ।

   * पुनः अगले जन्म में वे 'जड़भरत' नाम के महान ज्ञानी ब्राह्मण बने, जो बाहर से विरक्त/जड़वत दिखते थे।

   * सिंधु-सौवीर देश के राजा रहूगण को उन्होंने 'आत्मज्ञान' का ऐसा अलौकिक उपदेश दिया कि राजा का अज्ञान छँट गया।

 * लोकों एवं नरकों का वर्णन: इस स्कंध में सप्तद्वीप, जम्बूद्वीप, भू-मण्डल, सूर्य की गति, ग्रहों-नक्षत्रों की स्थिति तथा पापकर्मियों के लिए 28 प्रकार के नरकों (जैसे तामिस्र, अंधतामिस्र, रौरव आदि) का सूक्ष्म वर्णन है।

षष्ठ स्कंध: पोषण लीला (नाम महिमा व वृत्रासुर वध)

षष्ठ स्कंध में 19 अध्याय हैं। 'पोषण' का अर्थ है—भगवान का अपने भक्तों पर अनुग्रह (कृपा)।

 * अजामिल उपाख्यान (नाम महिमा): कान्यकुब्ज (कन्नौज) का एक अत्यंत पापी ब्राह्मण अजामिल, जो जीवनभर अधर्म में लीन रहा। मृत्यु के समय यमदूतों को देखकर उसने डरकर अपने छोटे पुत्र 'नारायण' को पुकारा। केवल 'नारायण' नाम का उच्चारण करने मात्र से विष्णुदूत वहाँ पहुँच गए और यमदूतों से अजामिल की रक्षा की।

   > सिद्धान्त: भगवन्नाम में अनजाने में भी लिया गया एक नाम जीव के जन्मांतरों के पापों को भस्म करने में समर्थ है।

   > 

 * वृत्रासुर का आख्यान:

   * देवराज इंद्र द्वारा विश्वरूप और तद्वुपरांत महर्षि दधीचि की अस्थियों से बने वज्र द्वारा वृत्रासुर का वध।

   * वृत्रासुर असुर कुल में जन्मा था, किंतु वह अपने पूर्वजन्म (राजा चित्रकेतु) के संस्कारों के कारण परम भागवत (श्रेष्ठ भक्त) था। युद्ध भूमि में भी उसकी भगवान के प्रति निष्काम भक्ति के श्लोक (अहं हरे तव पादैकमूलदासस्नुदासो भवितास्मि भूयः) भक्ति साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

सप्तम स्कंध: ऊति लीला (प्रह्लाद चरित्र व नवधा भक्ति)

सप्तम स्कंध में 15 अध्याय हैं। यह भक्ति की पराकाष्ठा का स्कंध है।

 * हिरण्यकशिपु का अत्याचार: ब्रह्मा जी से अमरता का वरदान पाकर हिरण्यकशिपु ने तीनों लोकों पर अधर्म का शासन स्थापित किया और भगवान के नाम-कीर्तन पर प्रतिबंध लगा दिया।

 * भक्त प्रह्लाद की अनन्य भक्ति: हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद गर्भ से ही भगवद्भक्त था। दैत्य गुरु शंड और अमर्क के आश्रम में पढ़ते हुए भी उसने अपने सहपाठियों को भक्ति का मार्ग सिखाया।

प्रह्लाद द्वारा प्रतिपादित नवधा भक्ति

1. श्रवणम् -> भगवान की कथा/गुण सुनना (उदा. परीक्षित)

2. कीर्तनम् -> भगवान के नाम का गान (उदा. शुकदेव जी)

3. स्मरणम् -> निरंतर चिंतन करना (उदा. प्रह्लाद)

4. पादसेवनम् -> चरणों की सेवा (उदा. माता लक्ष्मी)

5. अर्चनम् -> पूजन व आरती (उदा. राजा पृथु)

6. वन्दनम् -> स्तुति व प्रणाम (उदा. अक्रूर जी)

7. दास्यम् -> दास भाव (उदा. हनुमान जी)

8. सख्यम् -> मित्र भाव (उदा. अर्जुन व सुदामा)

9. आत्मनिवेदनम् -> स्वयं को पूर्णतः सौंप देना (उदा. राजा बलि)


 * नृसिंह अवतार व हिरण्यकशिपु वध: जब हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा कि "तुम्हारा विष्णु कहाँ है? क्या इस खंभे में है?", तो प्रह्लाद ने विश्वास जताया कि "वे सर्वत्र हैं।" राजा के खंभा तोड़ने पर भगवान नृसिंह (आधा सिंह, आधा मनुष्य) के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने संध्या काल में, देहरी पर बैठकर, अपने नखों से हिरण्यकशिपु का वक्षःस्थल विदीर्ण कर उसका उद्धार किया।

अष्टम स्कंध: ईशानुकथा (गजेन्द्र मोक्ष, समुद्र मंथन व वामन अवतार)

अष्टम स्कंध में 24 अध्याय हैं। इसमें भगवान की लीलाओं और विभिन्न मन्वंतरों के अवतारों की कथाएँ हैं।

 * गजेन्द्र मोक्ष: एक सरोवर में जब एक ग्राह (मगरमच्छ) ने गज (हाथी) का पैर पकड़ लिया, तो हजार वर्षों तक युद्ध के पश्चात जब गज का बल निष्फल हो गया, उसने सरोवर से एक कमल का पुष्प उठाकर भगवान हरि की अनन्य स्तुति की। भगवान गरुड़ पर सवार होकर आए और चक्र से ग्राह का वध कर गज का उद्धार किया। यह पूर्ण शरणागति का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।

 * समुद्र मंथन: देवताओं और असुरों ने मिलकर मंदर पर्वत और वासुकी नाग की नेति बनाकर क्षीरसागर का मंथन किया।

   * सर्वप्रथम विष (हलाहल) निकला, जिसे महादेव शिव जी ने जनकल्याण हेतु पान किया और 'नीलकंठ' कहलाए।

   * तत्पश्चात १४ रत्न (लक्ष्मी, ऐरावत, पारिजात, धन्वन्तरि आदि) प्रकट हुए।

   * अंत में अमृतरस का पान कराने के लिए भगवान ने मोहिनी अवतार धारण किया।

 * वामन अवतार व राजा बलि: दैत्यराज बलि के १००वें अश्वमेध यज्ञ में भगवान विष्णु बौने ब्राह्मण (वामन) के रूप में पहुँचे। उन्होंने बलि से तीन पग भूमि माँगी। दो पग में भगवान ने भूलोक और स्वर्गलोक नाप लिया। तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपना मस्तक समर्पित कर दिया। भगवान ने बलि से प्रसन्न होकर उसे सुतल लोक का राज्य दिया और स्वयं उसके द्वारपाल बने।

नवम स्कंध: ईश-कथा (सूर्यवंश एवं चंद्रवंश)

नवम स्कंध में 24 अध्याय हैं। इसमें सूर्यवंश और चंद्रवंश के महान राजाओं और भगवान श्रीराम के चरित्र का वर्णन है।

सूर्यवंश के प्रमुख आख्यान

 * अंबरीष और दुर्वासा की कथा: परम भागवत राजा अंबरीष ने एकादशी व्रत के पारण के समय महर्षि दुर्वासा के आगमन पर उनका आदर किया, किंतु समय बीतने पर केवल चरणोदक लिया। दुर्वासा जी ने क्रुद्ध होकर अपनी जटा से कृत्य राक्षसी उत्पन्न की। भगवान के सुदर्शन चक्र ने भक्त अंबरीष की रक्षा की और दुर्वासा जी को तीनों लोकों में दौड़ाया। अंत में दुर्वासा जी को अंबरीष के चरणों में ही क्षमा याचना करनी पड़ी।

 * भगीरथ एवं गंगावतरण: राजा सगर के ६०,००० पुत्रों के उद्धार हेतु भगीरथ का कठोर तप और स्वर्ग से गंगा जी का धरती पर अवतरण।

 * भगवान श्रीराम का पावन चरित्र: रघुवंश में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का अवतार, ताड़का वध, सीता स्वयंवर, वनवास, रावण वध और रामराज्य की स्थापना का संक्षेप किंतु ओजस्वी वर्णन।

चंद्रवंश के प्रमुख आख्यान

 * राजा ययाति: ययाति का अपनी युवावस्था की तीव्र कामनाओं को भोगने के बाद भी अतृप्त रहना और अंततः यह अनुभव करना कि "काम भोगों से कामवासना कभी शांत नहीं होती, जैसे अग्नि में घी डालने से वह और भड़कती है।"

 * यदुवंश की उत्पत्ति: ययाति के पुत्र यदु से 'यदुवंश' की स्थापना हुई, जिसमें स्वयं सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य होना निश्चित हुआ।

दशम स्कंध: निरोध लीला (श्रीकृष्ण का दिव्य चरित्र)

दशम स्कंध श्रीमद्भागवत का हृदय स्थल माना गया है। इसमें सर्वाधिक 90 अध्याय हैं, जिन्हें दो भागों में बाँटा गया है: पूर्वार्द्ध (व्रज लीला) और उत्तरार्द्ध (मथुरा व द्वारका लीला)।

दशम स्कंध (पूर्वार्द्ध): व्रज लीला

[कंस का अत्याचार व देवकी-वसुदेव विवाह] 

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[कारागार में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को श्रीकृष्ण प्राकट्य]

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[गोकुल गमन व नंदोत्सव - "नंद घरे आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की"]

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[बाल लीलाएँ एवं असुरों का उद्धार (पूतना, शकटासुर, तृणावर्त, बकासुर, अघासुर)]

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[माखन चोरी, उखल बंधन व दामोदर लीला]

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[कालिया मर्दन व दावाग्नि पान]

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[गोवर्धन धारण - इंद्र के अभिमान का भंजन]

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[रासपंचाध्यायी (अध्याय 29-33) - जीवात्मा व परमात्मा का अलौकिक मिलन]

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[अक्रूर आगमन व मथुरा यात्रा]

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[कंस वध व उग्रसेन का राज्याभिषेक]


 * दामोदर लीला: माता यशोदा का बालक कृष्ण को उखल से बाँधना। भगवान द्वारा यमलार्जुन (नलकूबर और मणिरत्न) का उद्धार। भगवान केवल 'प्रेम की डोरी' से बँधते हैं, भौतिक रस्सियों से नहीं।

 * गोवर्धन पूजा: श्रीकृष्ण ने वैदिक कर्मकांडीय इंद्र-पूजा के स्थान पर प्रकृति, गोधन और गोवर्धन पर्वत की पूजा का विधान शुरू किया। इंद्र के प्रलयंकारी कोप से गोकुलवासियों को बचाने के लिए ७ वर्ष के कृष्ण ने ७ दिन-रात अपनी कनिष्ठिका उंगली पर गोवर्धन पर्वत धारण किया।

 * रासपंचाध्यायी: यह भागवत का प्राण है। यह लौकिक कामवासना नहीं, बल्कि विशुद्ध अध्यात्म दर्शन है। गोपियाँ जीव की निर्मल वृत्तियाँ हैं और श्रीकृष्ण परमात्मा हैं। जब जीव का अहंकार पूरी तरह नष्ट हो जाता है, तब परमात्मा के साथ उसका अद्वैत मिलन (रास) सम्भव होता है।

दशम स्कंध (उत्तरार्द्ध): द्वारका लीला

 * रुकमिणी हरण: विदर्भ की राजकुमारी रुकमिणी ने श्रीकृष्ण के गुण-रूप सुनकर उन्हें मन ही मन अपना पति चुना और पत्र भेजकर अपना हरण करने की प्रार्थना की। भगवान ने रुक्मी को परास्त कर रुकमिणी से विवाह किया।

 * द्वारकाधीश रूप: द्वारका नगरी का निर्माण, १६,१०८ रानियों के साथ गृहस्थ धर्म का मर्यादापूर्वक निर्वहन, नरकासुर वध और १६,००० बंदी राजकुमारियों को सामाजिक सम्मान देकर स्वीकार करना।

 * सुदामा चरित्र: द्वारकाधीश श्रीकृष्ण और उनके बाल-सखा दरिद्र ब्राह्मण सुदामा का भावुक मिलन। सुदामा के बिना माँगे ही भगवान द्वारा उन्हें रिद्धि-सिद्धि और अलौकिक संपत्ति (दो लोक का वैभव) प्रदान करना। यह निष्काम मित्रता और भक्त-वत्सलता का अनुपम उदाहरण है।

एकादश स्कंध: मुक्ति लीला (उद्धव गीता व २४ गुरु)

एकादश स्कंध में 31 अध्याय हैं। यह ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का गंभीर दार्शनिक स्कंध है।

 * यदुकुल को शाप: पिंडारक क्षेत्र में ऋषियों के प्रति बालचपलता दिखाने पर यदुवंशियों को मूसल का शाप मिला, जो यदुवंश के संहार का कारण बना।

 * उद्धव गीता: श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन से पूर्व उनके परम प्रिय मित्र व भक्त उद्धव जी को दिया गया अंतिम उपदेश 'उद्धव गीता' कहलाता है।

 * अवधूत (दत्तात्रेय) के २४ गुरु: राजा यदु और अवधूत के संवाद में दत्तात्रेय जी बताते हैं कि उन्होंने प्रकृति की २४ वस्तुओं से ज्ञान प्राप्त किया:

1. पृथ्वी (सहनशीलता) 2. वायु (निरासक्त रहना) 3. आकाश (सर्वव्यापकता)

4. जल (पावनता व शीतलता) 5. अग्नि (तेजस्वी रहना) 6. चंद्रमा (घटने-बढ़ने में निर्विकार)

7. सूर्य (अनासक्त दान) 8. कबूतर (अति-आसक्ति का विनाश) 9. अजगर (संतोष व आजीविका)

10. समुद्र (गंभीरता) 11. पतंगा (रूप का मोह) 12. मधुमक्खी (संग्रह न करना)

13. हाथी (स्पर्श/काम मोह) 14. मधुहा (संचित धन का नाश) 15. हिरण (शब्द मोह/संगीत)

16. मछली (जिह्वा का स्वाद) 17. पिंगला वेश्या (आशा ही परम दुख है) 18. कुरर पक्षी (वस्तु का त्याग)

19. बालक (चिंतामुक्त अवस्था) 20. कुमारी कन्या (एकान्त का महत्व) 21. बाण बनाने वाला (एकाग्रता)

22. सर्प (गृह-निर्माण न करना) 23. मकड़ी (सृष्टि व संहार का सिद्धांत) 24. भृंगी कीड़ा (ध्यान तन्मयता)


 * श्रीकृष्ण का स्वधाम गमन: प्रभास क्षेत्र में जरा नामक व्याध का तीर पैर में लगने की लीला के साथ भगवान श्रीकृष्ण का अपने परम धाम गमन।

द्वादश स्कंध: आश्रय लीला (कलिधर्म, प्रलय व राजा परीक्षित मोक्ष)

द्वादश स्कंध में 13 अध्याय हैं। यह पुराण का उपसंहार है।

 * कलयुग के लक्षण (कलिधर्म): शुकदेव जी ने कलयुग के भावी परिवर्तनों की सटीक भविष्यवाणी की—कलयुग में धन ही कुलीनता का प्रमाण होगा, न्याय शक्ति के आधार पर चलेगा, विवाह केवल छल-छद्म पर टिकेगा, और धर्म केवल बाह्य आडंबर बनकर रह जाएगा।

 * कलिदोष से मुक्ति का एकमात्र साधन:

> अर्थात, कलयुग दोषों का खजाना है, किंतु इसमें एक बहुत बड़ा गुण है—कलयुग में केवल श्रीकृष्ण के नाम का कीर्तन (भगवन्नाम संकीर्तन) करने मात्र से जीव भवबंधन से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त कर लेता है।

 * परीक्षित की अभयता व मोक्ष: सातवें दिन जब तक्षक नाग परीक्षित को डसने आया, तब तक परीक्षित का देहाध्यास पूरी तरह समाप्त हो चुका था। वे ब्रह्म-ज्ञान में लीन थे। तक्षक ने केवल उनके स्थूल शरीर को जलाया, जबकि उनकी आत्मा भगवान के परम धाम में लीन हो चुकी थी।

 * महाप्रलय एवं भागवत की समाप्ति: नित्य, नैमित्तिक, प्राकृतिक और आत्यंतिक—चार प्रकार के प्रलयों का वर्णन। अंत में भागवत महापुराण की महिमा और फलश्रुति के साथ ग्रंथ पूर्ण होता है।

4. श्रीमद्भागवत का दार्शनिक एवं व्यावहारिक संदेश

श्रीमद्भागवत केवल कथाओं का संकलन नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक कला और दर्शन है:

 * अद्वैत तत्त्वज्ञान: वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ (सत्य एक ही है, जिसे ज्ञानी 'ब्रह्म', योगी 'परमात्मा' और भक्त 'भगवान' कहते हैं।)

 * निष्काम कर्म व शरणागति: फल की इच्छा से रहित होकर प्रत्येक कर्म को ईश्वर का पूजन समझकर करना।

 * मानवीय समरसता: जात-पात, अमीर-गरीब के भेद से परे हटकर प्राणिमात्र में ईश्वर के दर्शन करना। (जैसे शुकदेव जी की दृष्टि में राजा परीक्षित और निर्धन शबरी में कोई अंतर न था।)

 * आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता: आज के तनावग्रस्त, भौतिकवादी युग में श्रीमद्भागवत मनुष्य के अशांत मन को शांति प्रदान करती है, मृत्यु के भय से मुक्त करती है और जीवन में 'सत्य' तथा 'सद्भाव' की प्रतिष्ठा करती है।


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